Klassisches Tibetisch I/II
| Nr. | Tibetisch | Wylie | Bedeutung |
|---|---|---|---|
| 1 | སྒོམ་མ་ | sgom ma | Meditatorin; Asketin |
| 2 | ཞལ་ | zhal | Mund; Gesicht; Unterweisung; Rat (resp.) |
| 3 | བཅོམ་ལྡན་འདས་ | bcom ldan 'das | bCom ldan 'das (Beiname des Buddha); Skt. bhagavant |
| 4 | རྟེན་ | rten | Stuetze; Behaelter |
| 5 | མཆོད་རྟེན་ | mchod rten | Skt. stūpa |
| 6 | ཞྭ་ | zhwa | Hut |
| 7 | ཕྱི་རོལ་ | phyi rol | Aussenseite |
| 8 | དངོས་པོ་ | dngos po | Ding |
| 9 | ངན་པ་ | ngan pa | schlecht (Adj.) |
| 10 | བྱིས་པ་ | byis pa | Kind |
| 11 | དུས་ | dus | Zeit |
| 12 | འཁོར་ལོ་ | 'khor lo | Rad |
| 13 | ཡང་དགོན་པ་ | yang dgon pa | Yang dgon pa (NZ) |
| 14 | རི་ | ri | Berg |
| 15 | རི་ཆོས་ | ri chos | Berglehre |
| 16 | སྒྲ་ | sgra | Laut; Gerausch; Wort; Silbe; hier kurz fuer: Grammatik (sgra rig) |
| 17 | བསྟན་བཅོས་ | bstan bcos | Lehrabhandlung |
| 18 | དོན་ | don | Inhalt; Bedeutung; Sachverhalt; Zweck; Nutzen |
| 19 | ཏིང་ངེ་འཛིན་ | ting nge 'dzin | (meditative) Versenkung |
| 20 | ཡོན་ཏན་ | yon tan | Qualitaet; gute Eigenschaft |
| 21 | སྐབས་ | skabs | Abschnitt, Kapitel |
| 22 | དགེ་བ་ | dge ba | tugendhaft (Adj.); Tugend |
| 23 | ལས་ | las | Tat, Skt. karma |
| 24 | ལམ་ | lam | Pfad |
| 25 | ཁབ་ | khab | Hof; Residenz |
| 26 | གྲོང་ཁྱེར་ | grong khyer | groessere Siedlung; groesseres Dorf |
| 27 | བརྒྱུད་པ་ | brgyud pa | Ueberlieferung; Linie |
| 28 | ལོ་རྒྱུས་ | lo rgyus | Historie; Jahrkunde; Geschichte |
| 29 | ལྷ་རྗེ་ | lha rje | lHa rje (NZ) |
| 30 | ལྷ་ཁང་པ་ | lha khang pa | lHa khang pa (NZ) |
| 31 | ཐུགས་ | thugs | Herz, Geist (resp.) |
| 32 | ཉིད་ | nyid | eben; selbst (Suf, FokPart) |
| 33 | ཡོལ་ | yol | Yol (NZ; ON) |
| 34 | དགེ་བསྙེན་ | dge bsnyen | dGe bsnyen (NZ); Laienanhaenger; Skt. upāsaka |
| 35 | རྡོ་རྗེ་དབང་ཕྱུག་ | rdo rje dbang phyug | rDo rje dbang phyug (PN) |
| 36 | ཁོང་ | khong | er; sie (PersPron; 3. Pers.; resp.) |
| 37 | ངེད་ | nged | ich (PersPron; 1. Pers.; eleg.) |
| 38 | རང་ | rang | selbst (Pronomen) |
| 39 | འུ་ཅག་ | 'u cag | wir (PersPron; 1. Pers., Pl.) |
| 40 | ཁྱེད་ | khyed | Du; Ihr (PersPron; 2. Pers.; resp.) |
| 41 | མཆོད་གནས་ | mchod gnas | Gabenempfaenger (wtl. „Opferort") |
| 42 | ཡོ་བྱད་ | yo byad | Geraet; (materielles) Beduerfnis |
| 43 | འོ་སྐོལ་ | 'o skol | wir (PersPron; 1. Pers., Pl.) |
| 44 | བུ་ | bu | Sohn |
| 45 | ཁོ་བོ་ | kho bo | ich (PersPron; 1. Pers., mask.) |
| 46 | ངན་པ་ | ngan pa | schlecht (Adj.) |
| 47 | བློ་ | blo | Verstand |
| 48 | ལག་པ་ | lag pa | Hand |
| 49 | མཐིལ་ | mthil | Grund; Flaeche |
| 50 | བསོད་ནམས་ | bsod nams | (religioeses) Verdienst |
| 51 | དབུས་པ་ | dbus pa | dBus pa (NZ) |
| 52 | ཇོ་སྲས་ | jo sras | Jo sras (NZ; kurz fuer: Jo [bo] sras) |
| 53 | སངས་རྒྱས་རིན་ཆེན་པ་ | sangs rgyas rin chen pa | Sangs rgyas rin chen pa (PN) |
[Quelle: Lekt_09 WL, Nr. 1–53]
བོད་ཀྱི་སྐད་ [...]
W: bod: Tibet. –kyi: AttrSuf. skad: Sprache.
G: bod \<SbstAttr\> kyi \<AttrSuf\> skad \<Sbst\> [...]
Ü: Sprache Tibets
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 1]
| Silbenende | Allomorph | Beispiel |
|---|---|---|
| —ད་ / —བ་ / —ས་ | ཀྱི་ (kyi) | ཡབ་ཀྱི་སྤྱགས་ |
| —ག་ / —ང་ | གི་ (gi) | ལྷ་ཁང་གི་ཐང་ཀ་ |
| —ན་ / —མ་ / —ར་ / —ལ་ | གྱི་ (gyi) | ལམ་གྱི་རིམ་པ་ |
| —འ་ | °འི་ (Finalskript) | ནམ་མཁའི་ཁམས་ |
| —Vok. | °འི་ (dem Vokal angehängt) | རྒྱལ་པོའི་ཁབ་ |
| —Vok. | ཡི་ (silbisch) | ལྷ་ཡི་སྲས་ |
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 1]
དགོན་པའི་མིང་ [...]
W: dgon pa: Kloster. –i: AttrSuf. ming: Name.
G: dgon pa \<SbstAttr\> 'i \<AttrSuf\> ming \<Sbst\> [...]
Ü: der Name des Klosters
[...] ཀླུའི་རྒྱལ་པོ་ [...]
W: klu: Klu-[Geist]. –i: AttrSuf. rgyal po: König.
G: [...] klu \<SbstAttr\> 'i \<AttrSuf\> rgyal po \<Sbst\> [...]
Ü: der König der Klu-[Geister]
མིའི་བདག་པོ་ [...]
W: mi: Mensch. -'i: AttrSuf. bdag po: Herrscher.
G: mi \<SbstAttr\>'i \<AttrSuf\> bdag po \<Sbst\> [...]
Ü: der Herrscher der Menschen
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 1]
[...] མཁན་པོའི་བྱ་བ་ [...]
W: mkhan po: Abt. –i: AttrSuf. bya ba: Handlung.
G: mkhan po \<SbstAttr\> 'i \<AttrSuf\> bya ba \<Sbst\> [...]
Ü: [die] Handlungen des Abtes
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 1–2]
[...] རྗེ་བཙུན་ཀ་རོ་པའི་བསྟོད་པ་ [...]
W: rje btsun: NZ. ka ro pa: PN. –'i: AttrSuf. bstod pa: Lobpreis.
G: [...] rje btsun ka ro pa \<SbstAttr\> 'i \<AttrSuf\> bstod pa \<Sbst\> [...]
Ü: der Lobpreis des rJe btsun Ka ro pa
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 2]
སྐུ་མཆེད་གསུམ་གྱི་ཆེ་བ་ [...]
W: sku mched: Brüder (resp.). gsum: drei. –gyi: AttrSuf. che ba: Höchster; Ältester.
G: sku mched gsum \<SbstAttr\> gyi \<AttrSuf\> che ba \<Sbst\> [...]
Ü: der Älteste der drei Brüder
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 2]
སྤྱིལ་པོའི་ཀ་བ་ [...]
W: spyil po: Hütte. –'i: AttrSuf. ka ba: Stütze; Pfosten.
G: spyil po \<SbstAttr\> 'i \<AttrSuf\> ka ba \<Sbst\> [...]
Ü: die Stützen der Hütte
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 2]
[...] གསེར་གྱི་ལྷ་ཁང་ [...]
W: gser: Gold. –gyi: AttrSuf. lha khang: Tempel.
G: [...] gser \<SbstAttr\> gyi \<AttrSuf\> lha khang \<Sbst\> [...]
Ü: Goldtempel
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 2]
[...] འཁྲུགས་པའི་སྐྱོན་ [...]
W: 'khrugs pa: Krieg. –'i: AttrSuf. skyon: Makel.
G: [...] 'khrugs pa \<SbstAttr\> 'i \<AttrSuf\> skyon \<Sbst\> [...]
Ü: die Makel des Krieges
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 2]
[...] ཤར་ཕྱོགས་ཀྱི་སེམས་ཅན་ [...]
W: shar: Osten. phyogs: Richtung. –kyi: AttrSuf. sems can: Lebewesen.
G: [...] shar phyogs \<SbstAttr\> kyi \<AttrSuf\> sems can \<Sbst\> [...]
Ü: die Lebewesen des Ostens
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 2]
[...] གླང་ཐང་པའི་སྐབས་ [...]
W: glang thang pa: PN. –i: AttrSuf. skabs: Kapitel, Abschnitt.
G: [...] glang thang pa \<SbstAttr\> 'i \<AttrSuf\> skabs \<Sbst\> [...]
Ü: das Kapitel über [das Leben des] Glang thang pa
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 3]
རྣལ་འབྱོར་མའི་རྒྱུད་ཀྱི་བཤད་པའི་དར་སོ་ [...]
W: rnal 'byor ma: Skt. yoginī. –'i: AttrSuf. rgyud: Skt. tantra. –kyi: AttrSuf. bshad pa: Erklärung. –'i: AttrSuf. dar so: Verbreitung.
G: rnal 'byor ma \<SbstAttr\> 'i \<AttrSuf\> rgyud \<SbstAttr\> kyi \<AttrSuf\> bshad pa \<SbstAttr\> 'i \<AttrSuf\> dar so \<Sbst\> [...]
Ü: die Verbreitung der Erklärungen zu den Yoginī-Tantras
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 3]
[...] དྲག་པོའི་ལས་ཀྱི་ནུས་པ་ [...]
W: drag po: stark; heftig (Adj). –'i: AttrSuf. las: Handlung. –kyi: AttrSuf. nus pa: Vermögen.
G: [...] drag po \<AdjAttr\> 'i \<AttrSuf\> las \<SbstAttr\> kyi \<AttrSuf\> nus pa \<Sbst\> [...]
Ü: das Vermögen zu heftigen Handlungen
དམ་པའི་ཆོས་ [...]
W: dam pa: edel (Adj). –i: AttrSuf. chos: Lehre.
G: dam pa \<AdjAttr\> 'i \<AttrSuf\> chos \<Sbst\> [...]
Ü: edle Lehre (Skt.: saddharma)
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 3]
[...] བོད་སྤྱི་ལ་དབང་བྱེད་པའི་རྒྱལ་པོ་ [...]
W: bod: Tibet. spyi: allgemein (hier: gesamt). –la: in (PP). dbang: Macht. byed pa: machen (tdV; 1.SF). –'i: AttrSuf. rgyal po: König.
G: bod \<Sbst\> spyi \<AdjAttr\> la \<PP\> dbang \<Sbst\> byed pa \<Part/VSbst\> 'i \<AttrSuf\> rgyal po \<Sbst\>
Ü: der im gesamten Tibet Macht ausübende König / der König, der im gesamten Tibet Macht ausübt
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 3]
དེའི་ཕྲིན་ལས་ [...]
W: de: jener (DemPron). –'i: AttrSuf. phrin las: Handlung (resp.).
G: de \<DemPron\> 'i \<AttrSuf\> phrin las \<Sbst\> [...]
Ü: dessen Handlungen
དེའི་དུས་སུ་ [...]
W: de: jener (DemPron). –'i: AttrSuf. dus: Zeit. –su: in; zu (PP).
G: de \<DemPron\> 'i \<AttrSuf\> dus \<Sbst\> su \<PP\> [...]
Ü: zu jener Zeit
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 3–4]
ཁྱོད་ཀྱི་ཁང་པ་ [...]
W: khyod: du. –kyi: AttrSuf. khang pa: Haus.
G: khyod \<PersPron\> kyi \<AttrSuf\> khang pa \<Sbst\> [...]
Ü: dein Haus
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 4]
[...] སྔར་གྱི་ཆོས་བརྗེད་པ་ཐམས་ཅད་ [...]
W: sngar: früher. –gyi: AttrSuf. chos: Lehre. brjed pa: vergessen (tmdV; 2.,3.SF). thams cad: alle (IndPron).
G: [...] sngar \<Adv\> gyi \<AdjAttr\> chos \<Sbst\> brjed pa \<Part\> thams cad \<IndPron\> [...]
Ü: alle vergessenen Lehren von früher
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 4]
[...] དབུས་པ་དགེ་སློང་ཚུལ་ཁྲིམས་འབར་ [...]
W: dbus pa: ON (NZ, Person, die aus dBus kommt). dge slong: Mönch. tshul khrims 'bar: PN.
G: [...] dbus pa dge slong \<App\> tshul khrims 'bar \<Sbst\> [...]
Ü: dBus pa dGe slong Tshul khrims 'bar (der Mönch Tshul khrims 'bar aus dBus)
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 4]
| Gesprächsebene | 1. Person | 2. Person | 3. Person |
|---|---|---|---|
| förmlich – respektvoll | - | ཁྱེད་ (khyed) | ཁོང་ (khong) |
| nicht förmlich – neutral | ང་ (nga), ངེད་ (nged), ངོས་ (ngos), ཁོ་བོ་ (kho bo); mask. / ཁོ་མོ་ (kho mo); fem. | ཁྱོད་ (khyod) | ཁོ་ (kho); mask. / མོ་ (mo); fem. |
| bescheiden (elegant) | བདག་ (bdag) | - | - |
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 4]
| 1. Person | 2. Person | 3. Person | Pluralsuffix |
|---|---|---|---|
| ངེད་ (nged) | ཁྱེད་ (khyed) | ཁོང་ (khong) | རྣམས་ (-rnams) |
| ང་ (nga), བདག་ (bdag) | ཁྱེད་ (khyed) | - | ཅག་ (-cag) |
| ང་ (nga) | ཁྱེད་ (khyed), ཁྱོད་ (khyod) | - | ཚོ་ (-tsho) |
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 5]
Dem Personalpronomen kann zur Verstärkung das Pronomen རང་ (rang) angehängt werden. Das Pronomen ist relativ frei kombinierbar und tritt hinter die Personalpronomen der 1., 2. und 3. Person:
Unter Umständen wird auch das Personalpronomen elidiert, so dass nur das Pronomen རང་ (rang) im Satz steht.
Pluralformen um die durch das Pronomen རང་ (rang) betonten Personalpronomen werden mit den Suffixen རྣམས་ (-rnams) und ཚོ་ (-tsho) gebildet.
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 5]
Dem Personalpronomen kann zur Verstärkung auch das Suffix ཉིད་ (-nyid) angehängt werden.
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 5]
ང་ (nga), ངེད་ (nged), ཁོ་བོ་ (kho bo) und ཁོ་མོ་ (kho mo)
(1) ང་ད་ལྟ་འཆི་བར་འདུག་གསུང་།
Ü: [Er] sagt[e]: „Ich (nga) sterbe jetzt [gewiss]."
(2) ཨེ་རྣལ་འབྱོར་མ་འདི་ང་ལ་བསླུན་ཟེར་བར་འདུག
Ü: [Er] hat gesagt: „Ach, diese Yoginī hat mich (nga) angelogen."
(3) [...] ངེད་ཀླུང་ཤོད་ལ་འགྲོ་བ་ཡིན་གསུང་ [...]
Ü: [Er] sagt[e]: „Ich (nged) werde nach Klung shod reisen."
(4) ངེད་རང་ཆོས་གཏམ་ཉམས་དགའ་མོ་བྱའོ་བྱས་ [...]
Ü: [Er] sagte: „Ich selbst (nged rang) will einen guten Vortrag über die religiöse Lehre erteilen."
(5) ཁོ་བོ་བོད་དུ་འོང་དགོས་པར་བྱུང་།
Ü: „Ich (kho bo) musste nach Tibet kommen."
(6) ད་ཁོ་བོ་རབས་མི་འཆད་པར་འདུག་གསུང་ [...]
Ü: [Er] sagt[e]: „Jetzt ist [meine] (kho bo) Linie nicht abgeschnitten."
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 6]
བདག་ (bdag)
(7) དེ་ལ་བདག་གིས་ལེགས་པར་ཐོས་པ་ལགས་སོ།
Ü: „Von ihm habe ich (bdag) [es] gut gehört."
(8) བདག་གིས་ལུས་ལོངས་སྤྱོད་སྤྱལ་བ་ལགས་ཞེས་ [...]
Ü: [Sie] sagte: „Ich (bdag) habe [mein] Körper [und] Reichtum fortgegeben."
(9) བདག་དགེ་མ་ལུས་དེར་སྨིན་ཤོག (DT: 245)
Ü: „Mögen alle meine (bdag) Tugendwerke in jenen reifen."
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 6]
འོ་སྐོལ་ ('o skol) und འུ་ཅག་ ('u cag)
(10) འོ་སྐོལ་ཆོས་ཀྱི་གསུང་གླེངས་བྱེད་པ་ཡིན་གསུངས་ [...]
Ü: [Er] sagte: „Wir ('o skol) werden ein Gespräch über die religiöse Lehre führen."
(11) དེ་ནས་འོ་སྐོལ་ཕ་སྤུད་དགའ་ལྡན་དུ་དུས་བྱའོ་གསུང་ངོ་།
Ü: [Er] sagt[e]: „Wir ('o skol), Vater [und] Kind, werden einen Zeitpunkt [für unser Treffen] im [Götterbereich] Tuṣita fixieren."
(12) རྣལ་འབྱོར་མ་འུ་ཅག་གཉིས་འདེང་ངོ་གསུང་ [...]
Ü: [Er] sagte: „Yoginī, lass uns zwei ('u cag gnyis) [jetzt] gehen."
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 6–7]
ཁྱོད་ (khyod)
(13) ངས་ཁྱོད་ཀྱི་གྲོགས་བྱའོ་གསུང་།
Ü: [Er] sagt[e]: „Ich (nga) werde mit Dir (khyod) Freundschaft schließen."
(14) ཁོ་བོའི་ཆོས་ཀྱི་བདག་པོ་ཁྱོད་ཀྱིས་བྱེད་པ་ཡིན་ཡང་གསུང་།
Ü: Weiterhin sagt[e] [er]: „Du (khyod) wirst als Besitzer meiner (kho bo) Lehren agieren."
(15) སྐྱེས་བུ་དམ་པ་ཁྱོད་དང་ཚེ་རབས་ཐམས་ཅད་དུ་མཇལ་བར་ཤུར་ཅིག་ཅེས་བྱ་བའི་སྨོན་ལམ་ཡང་མང་དུ་བཏབ།
Ü: [Er] sprach viele Wunschgebete aus, die so lauteten: „Möge [ich] in allen Existenzen mit Dir (khyod), einem edlen Lebewesen, zusammentreffen."
(16) ཁྱོད་མ་བཞུགས་ཟེར་ [...]
Ü: [Sie] sagte: „Du (khyod) darfst nicht bleiben!"
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 7]
ཁྱེད་ (khyed)
(17) ཁྱེད་ལ་གདམས་པ་ཟབ་མོ་ཡོད་པར་འདུག་བྱས་ [...]
Ü: [Er] sagte: „Du (khyed) besitzt [offenbar] tiefgründige Unterweisungen."
(18) ཁྱེད་རང་སློབ་མ་རྣམས་ཀྱི་ཁམས་རྒྱུད་ལ་ཞོད་པ་ཡིན་གསུང་།
Ü: [Er] sagt[e]: „[Ich] werde im Gedächtnis von Euch (khyed rang) Schülern bleiben."
(19) ང་དང་ཁྱེད་ལ་ལས་འབྲེལ་ཅིག་ཀྱང་ཡོད་པར་འདུག་གསུང་།
Ü: [Er] sagt[e]: „Wir (wtl.: Ich und Du) (nga dang khyed) haben [offensichtlich] eine karmische Verbindung."
(20) ཁྱེད་རྣམས་བླ་མ་ངན་དུ་མི་འགྲོ།
Ü: „Ihr (khyed rnams) sollt nicht zu einem schlechten Lehrer gehen."
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 7]
ཁོ་ (kho) und མོ་ (mo)
(21) ཁོ་དང་བསྙོངས་ནས་སྒམ་པོར་བྱོན།
Ü: Nachdem [er] sich ihm (kho) angeschlossen hatte, reisten [sie] nach sGam po.
(22) མོ་ན་རེ།
Ü: Sie (mo) sagte: „[...]"
(23) [...] ཁོ་རང་གི་དོན་བྱས་ནས་འདུག་གསུང་།
Ü: [Er] sagt[e]: „[Er] hat zum Nutzen für sich selbst (kho rang) gewirkt."
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 8]
ཁོང་ (khong)
(24) ཁོང་རྒྱ་གར་རྒྱལ་པོའི་བཙུན་མོ་འདི་སྐད་བྱ་བའི་མངལ་ན་ཞུགས་ཡོད།
Ü: Er (khong) ist in den Mutterleib einer sogenannten Frau eines indischen Königs eingetreten.
(25) [...] ཁོང་གཙང་དུ་གཤེགས།
Ü: Er (khong) reiste nach gTsang.
(26) ཁོང་གིས་དཀོན་མཆོག་ལ་གསོལ་བ་བཏབ་ [...]
Ü: Er (khong) sprach Gebete für die [drei] Juwelen aus.
[Quelle: Lekt_09 HO, S. 8]
Aufgabe: Geben Sie eine grammatische Analyse aller Konstituenten der Nominalphrase und übersetzen Sie die Phrase.
| Nr. | Tibetisch |
|---|---|
| 1 | [...] སྒོམ་མ་དེའི་ཞལ་ [...] |
| 2 | བཅོམ་ལྡན་འདས་ཀི་མཆོད་རྟེན་ [...] |
| 3 | [...] ངའི་ཞྭ་དེ་ [...] |
| 4 | [...] གསང་སྔགས་ཀི་གདམས་པ་མང་དུ་ [...] |
| 5 | ཁྲི་ལོའི་དགུན་ [...] |
| 6 | ཕྱི་རོལ་གི་དངོས་པོ་ངན་པ་རྣམས་ [...] |
| 7 | བྱིས་པའི་དུས་ [...] |
| 8 | [...] ཆོས་ཀི་འཁོར་ལོ་མང་དུ་ [...] |
| 9 | [...] ཡང་དགོན་པའི་རི་ཆོས་རྣམས་ [...] |
| 10 | སྒྲའི་བསྟན་བཅོས་ཀི་དོན་ [...] |
| 11 | [...] ཏིང་ངེ་འཛིན་གི་ཡོན་ཏན་དུ་མ་ [...] |
| 12 | བོད་ཀི་རྒྱལ་རབས་ཀི་སྐབས། |
| 13 | [...] དགེ་བ་བཅུའི་ལས་ཀི་ལམ་ [...] |
| 14 | རྒྱལ་པོའི་ཁབ་ཀི་གྲོང་ཁྱེར་ [...] |
| 15 | གཞན་རྣམས་ཀི་དཀིལ་འཁོར་གི་ཆོ་ག་མང་དུ་ [...] |
| 16 | [...] བརྒྱུད་པ་འདིའི་ལོ་རྒྱུས་ཀི་ཡི་གེ་ [...] |
| 17 | [...] ལམ་གི་རིམ་པའི་བསྟན་བཅོས་ [...] |
| 18 | ལྷ་རྗེ་ལྷ་ཁང་པའི་ཐུགས་ཀི་སྲས་དམ་པ་ [...] |
| 19 | [...] ཡི་དམ་གི་ལྷ་མང་པོ་ [...] |
| 20 | དེ་ཉིད་ཀི་སློབ་མ་ཡོལ་དགེ་བསྙེན་རྡོ་རྗེ་དབང་ཕྱུག་ [...] |
| 21 | [...] ཁོང་རྣམས་ [...] |
| 22 | ངེད་རང་ཚོ་ [...] |
| 23 | རང་ཉིད་ [...] |
| 24 | འུ་ཅག་ཚོ་ [...] |
| 25 | [...] ངེད་རྣམས་ [...] |
| 26 | ཁྱེད་རང་གི་ཐུགས་ [...] |
| 27 | བདག་གི་མཆོད་གནས་ [...] |
| 28 | ཁོང་གཉིས་ཀི་ཞལ་ [...] |
| 29 | [...] ཁོང་རང་ཉིད་ཀི་གསུང་ [...] |
| 30 | བདག་ཅག་གི་སྟོན་པ་ [...] |
| 31 | [...] ཁྱོད་རང་གི་ཡོ་བྱད་རྣམས་ [...] |
| 32 | འོ་སྐོལ་གི་བརྒྱུད་པ་འདི་ [...] |
| 33 | [...] ངའི་བུ་དེ་ [...] |
| 34 | [...] ཁོ་བོའི་ལས་ངན་ [...] |
| 35 | [...] ཁྱེད་རྣམས་ཀི་བློ་ [...] |
| 36 | [...] ཁོའི་ལག་པའི་མཐིལ་ [...] |
| 37 | [...] ང་རང་གི་བསོད་ནམས་ [...] |
| 38 | [...] ཁྱེད་རང་གི་བླ་མ་ [...] |
| 39 | དབུས་པའི་ཇོ་སྲས་ཁྱོད་ [...] |
| 40 | [...] བདག་གི་བླ་མ་སངས་རྒྱས་རིན་ཆེན་པ་ [...] |
[Quelle: Lekt_09 UEB, Nr. 1–40]
Wie der Instrumental hat auch die Genitivpartikel fünf verschiedene Formen, die sich nach dem vorangehenden Auslaut richten. Sie lauten:
| Die Formen des Genitivs | Beispiele | |
|---|---|---|
| གྱི་ | nach den Auslauten ད་, བ་, ས་ | ཡབ་གྱི་, རྒྱབ་གྱི་, ལུས་གྱི་ |
| གི་ | nach den Auslauten ག་, ང་ | མིག་གི་, དབང་གི་ |
| གྱི་ | nach den Auslauten ན་, མ་, ར་, ལ་ | ཨན་གྱི་, ལམ་གྱི་, གུར་གྱི་, ཞལ་གྱི་ |
| -འི་ | nach vokalischem Auslaut und anstelle von འ་ | ང་ - ངའི་, མདའ་ - མདའི་ |
| ཡི་ | dient als silbisches Äquivalent für -འི་ zur Ausfüllung eines Versfußes | ང་ - ང་ཡི་, མདའ་ - མདའ་ཡི་ |
Setzt man mit den tibetischen Grammatikern bei den Instrumentalpartikeln die ursprüngliche Form -འིས་ an die Stelle von -ས་, so sieht man, daß die Instrumentalpartikeln die um -ས་ vermehrten Genitivpartikeln sind.
[Quelle: Hahn_Lekt.10_Genitivpartikel, S. 79]
Der Genitiv ist im Tibetischen der attributive Kasus schlechthin. Seine Aufgabe besteht darin, einen unmittelbar auf ihn folgenden substantivischen Begriff näher zu erläutern. Hierbei entsteht eine Reihe verschiedenartiger Beziehungen, von denen die wichtigsten nachstehend beschrieben werden.
Der subjektive Genitiv bezeichnet das logische Subjekt zum folgenden Begriff. Dieser kann aus einem echten Substantiv bestehen (dann ist eine Verbalhandlung sinngemäß zu ergänzen) oder aber aus einem Verbalsubstantiv.
Wenn das Hinterglied aus einer Verbalhandlung besteht, ergibt sich leicht die Gefahr einer Verwechslung mit dem objektiven Genitiv, vgl. b). Auf der anderen Seite wird bei einem verbalen Hinterglied das vorangehende Subjekt nicht selten durch den Instrumental des Agens ausgedrückt, welcher den verbalen Aspekt des Verbalsubstantivs besonders betont.
[Quelle: Hahn_Lekt.10_Genitivpartikel, S. 79–80]
Der objektive Genitiv bezeichnet das Objekt der durch das Hinterglied ausgedrückten Verbalhandlung. Das Hinterglied kann wie in a) ein reines Substantiv oder ein Verbalsubstantiv sein.
Wenn im Hinterglied ein Verbalsubstantiv steht, bleibt jedoch meist die Kasusrektion des Verbalstamms erhalten, d.h. im Vorderglied steht der Akkusativ, Instrumental, Lokativ II oder Ablativ.
[Quelle: Hahn_Lekt.10_Genitivpartikel, S. 80]
Der possessive Genitiv bezeichnet den Besitzer der Sache, die durch den auf ihn folgenden Begriff benannt wird.
Das Tibetische verwendet den Genitiv der Personalpronomen als Possessivpronomina.
[Quelle: Hahn_Lekt.10_Genitivpartikel, S. 80]
Der partitive Genitiv bezeichnet einen Teil aus einer Gesamtheit.
Ein adjektivisches Hinterglied ist sehr oft superlativisch zu übersetzen.
[Quelle: Hahn_Lekt.10_Genitivpartikel, S. 80–81]
Der qualitative Genitiv bezeichnet den Stoff oder die Materie, aus der das Hinterglied besteht.
[Quelle: Hahn_Lekt.10_Genitivpartikel, S. 81]
Der Genitiv des Nutzens und des Schadens gibt an, für wen, zu wessen Verfügung, Vorteil oder Nachteil etwas da ist oder geschieht.
[Quelle: Hahn_Lekt.10_Genitivpartikel, S. 81]
Der erklärende Genitiv bestimmt den begrifflichen Inhalt einer im übergeordneten Substantiv gegebenen allgemeinen Benennung.
Der erklärende Genitiv wird — vor allem in der dichterischen Sprache — sehr häufig zur Bildung verkürzter Vergleiche verwendet.
[Quelle: Hahn_Lekt.10_Genitivpartikel, S. 81]
Ein dem Bezugswort vorangestelltes Attribut muß im Tibetischen grundsätzlich im Genitiv stehen. Das Attribut kann aus einem einzelnen Wort (Adjektiv, Pronomen, Substantiv) oder aus einem komplexen Ausdruck bestehen.
[Quelle: Hahn_Lekt.10_Genitivpartikel, S. 81–82]
Nahezu alle Postpositionen, die ihrerseits in der Regel aus der Kombination Nominalstamm — Kasuspartikel bestehen, werden mit dem Genitiv konstruiert.
[Quelle: Hahn_Lekt.10_Genitivpartikel, S. 82]
In einigen Fällen hat sich aus einem häufig gebrauchten attributiven Genitiv ein neues Nomen entwickelt, das seinerseits wieder Kasuspartikeln annehmen kann.
[Quelle: Hahn_Lekt.10_Genitivpartikel, S. 82]