Lektion 30 -- Die Konjunktionen -cing, -te und -la hinter einem Verbstamm
Wortliste
| Nr. | Tibetisch | Wylie | Wortart | Bedeutung | Quelle |
| ----- | ----------- | ------- | --------- | ----------- | -------- |
| 1 | གཡུང་སྟོན་པ་ | g.yung ston pa | NZ | gYung ston pa | Lekt_30 WL, Nr. 1 |
| 2 | གདུང་རུས་ | gdung rus | Subst. | Familienklan | Lekt_30 WL, Nr. 2 |
| 3 | གླན་ | glan | NZ | Glan | Lekt_30 WL, Nr. 3 |
| 4 | ཚོང་འདུས་པ་ | tshong 'dus pa | ON | Tshong 'dus pa | Lekt_30 WL, Nr. 4 |
| 5 | མེས་ | mes | NZ | Mes | Lekt_30 WL, Nr. 5 |
| 6 | རྟོག་ | rngog | NZ | rNgog | Lekt_30 WL, Nr. 6 |
| 7 | འཚུར་ | 'tshur | NZ | 'Tshur | Lekt_30 WL, Nr. 7 |
| 8 | མི་ལ་ | mi la | NZ | Mi la | Lekt_30 WL, Nr. 8 |
| 9 | ཡར་ | yar | Adv | hinauf; nach oben | Lekt_30 WL, Nr. 9 |
| 10 | སྟོང་ | song | tmdV; 4.SF | gehen | Lekt_30 WL, Nr. 10 |
| 11 | ཉྟོན་ | nyon | tdV; 4.SF | hoeren; studieren | Lekt_30 WL, Nr. 11 |
| 12 | བར་སྐབས་ | bar skabs | Subst. | Zwischenzeit | Lekt_30 WL, Nr. 12 |
| 13 | བྱང་སེམས་ | byang sems | NZ | Byang [chub] sems [dpa'] | Lekt_30 WL, Nr. 13 |
| 14 | ཟླ་རྒྱལ་ | zla rgyal | PN | Zla [ba] rgyal [mtshan] | Lekt_30 WL, Nr. 14 |
| 15 | ཉེ་གནས་ | nye gnas | Subst. / NZ | Begleiter; NZ | Lekt_30 WL, Nr. 15 |
| 16 | སྣ་ཚོགས་ | sna tshogs | Adj | verschiedene(r); mancherlei | Lekt_30 WL, Nr. 16 |
| 17 | སི་ཚང་ | skyi tshang | ON | sKyi tshang | Lekt_30 WL, Nr. 17 |
| 18 | ཉམས་ལེན་ | nyams len | Subst. | Praxis | Lekt_30 WL, Nr. 18 |
| 19 | ཤ་སྟོན་ | sha ston | NZ | Sha ston | Lekt_30 WL, Nr. 19 |
| 20 | ཕུ་ཐང་ | phu thang | ON | Phu thang | Lekt_30 WL, Nr. 20 |
| 21 | དཔལ་ཆེན་ | dpal chen | NZ | dPal chen | Lekt_30 WL, Nr. 21 |
| 22 | ཆྟོས་ཡེ་ | chos ye | PN | Chos [kyi] ye [shes] | Lekt_30 WL, Nr. 22 |
| 23 | དྲག་པྟོ་ | drag po | Adj | stark; heftig; hier: schlecht | Lekt_30 WL, Nr. 23 |
| 24 | ཀི་རེན་གིས་ | kyi rkyen gyis | PP | aufgrund | Lekt_30 WL, Nr. 24 |
| 25 | དམྱལ་བ་ | dmyal ba | Subst. | Hoelle | Lekt_30 WL, Nr. 25 |
| 26 | ལྷུང་བ་ | lhung ba | tmdV; 2.SF | (herab)fallen | Lekt_30 WL, Nr. 26 |
| 27 | ཡུལ་ས་ | yul sa | Subst. | Ort; Land | Lekt_30 WL, Nr. 27 |
| 28 | བིར་ཝ་པ་ | bir wa pa | PN | Viruupa | Lekt_30 WL, Nr. 28 |
| 29 | ཀི་དྲུང་དུ་ | kyi drung du | PP | bei | Lekt_30 WL, Nr. 29 |
| 30 | ཆྟོས་སྟོང་ | chos skyong | Subst. | Schutzgottheit | Lekt_30 WL, Nr. 30 |
| 31 | གཞི་བདག་ | gzhi bdag | Subst. | Ortsgottheit | Lekt_30 WL, Nr. 31 |
| 32 | གདན་ | gdan [sa] | Subst. | Kloster | Lekt_30 WL, Nr. 32 |
| 33 | སེང་གེ་ | seng ge | Subst. | Loewe | Lekt_30 WL, Nr. 33 |
| 34 | ཕྱགས་ཕྱི་ | phyags phyi | Subst. | Diener | Lekt_30 WL, Nr. 34 |
| 35 | སན་ | stan | Subst. | Sitzmatte | Lekt_30 WL, Nr. 35 |
| 36 | ཐྟོགས་པ་མེད་པར་ | thogs pa med par | Adv | unbehindert | Lekt_30 WL, Nr. 36 |
| 37 | འཛེགས་པ་ | 'dzegs pa | tdV; 2.SF | hinaufsteigen | Lekt_30 WL, Nr. 37 |
| 38 | དགུ་བཅུ་རྩ་བདུན་ | dgu bcu rtsa bdun | ZW | siebenundneunzig | Lekt_30 WL, Nr. 38 |
| 39 | ངྟོ་མཚར་བ་ | ngo mtshar ba | Adj | wundervoll | Lekt_30 WL, Nr. 39 |
| 40 | ལྟས་ | ltas | Subst. | Zeichen | Lekt_30 WL, Nr. 40 |
| 41 | རས་པ་ | ras pa | NZ | Ras pa | Lekt_30 WL, Nr. 41 |
| 42 | རྟོ་རེ་དཔལ་ | rdo rje dpal | PN | rDo rje dpal | Lekt_30 WL, Nr. 42 |
| 43 | ལྟོ་བལ་ | lho bal | Subst. | Indien (wtl.: Sueden) und Nepal (kurz fuer: lho dang bal yul) | Lekt_30 WL, Nr. 43 |
| 44 | གསེར་གདུགས་ | gser gdugs | Subst. | Goldschirm | Lekt_30 WL, Nr. 44 |
| 45 | གྷ་ཊི་ར་ | gha thi ra | Subst. | Ganjira (d.i. ein turmaehnlicher Ornamentaufbau auf Sakralbauten; gewoehnlich: gan ji ra) | Lekt_30 WL, Nr. 45 |
| 46 | མཐྟོ་འཚམ་པ་ | mtho 'tsham pa | tmdV; 1.,3.SF | Wettstreit halten; konkurrieren | Lekt_30 WL, Nr. 46 |
| 47 | བརེས་པ་ | brnyes pa | tmdV; 1.,2.,3.SF | erlangen | Lekt_30 WL, Nr. 47 |
| 48 | བཙལ་བ་ | btsal ba | tdV; 2.,3.SF | suchen | Lekt_30 WL, Nr. 48 |
| 49 | ནམ་ཞིག་ | nam zhig | Adv | eines Tages | Lekt_30 WL, Nr. 49 |
| 50 | ནགས་གསེབ་ | nags gseb | Subst. | Wald | Lekt_30 WL, Nr. 50 |
| 51 | གཏྟོར་བ་ | gtor ba | tdV; 1.,2.,3.SF | fortgeben | Lekt_30 WL, Nr. 51 |
| 52 | ཤམ་ཐབས་ | sham thabs | Subst. | Unterkleid | Lekt_30 WL, Nr. 52 |
| 53 | གྟོན་པ་ | gyon pa | tdV; 1.,2.,3.SF | anziehen | Lekt_30 WL, Nr. 53 |
| 54 | སན་ཐྟོག་ | stan thog | Subst. | Sitzmatte | Lekt_30 WL, Nr. 54 |
| 55 | བསེད་རིམ་ | bskyed rim | Subst. | Skt. utpattikrama; Erzeugungsstufe | Lekt_30 WL, Nr. 55 |
| 56 | བརྟན་པ་ | brtan pa | Subst. | Festigkeit; Sicherheit | Lekt_30 WL, Nr. 56 |
| 57 | དངྟོས་སུ་ | dngos su | Adv | wirklich | Lekt_30 WL, Nr. 57 |
[Quelle: Lekt_30 WL]
Grammatik
[Quelle: Lekt_30 HO]
Die Konjunktionen cing, te und la hinter einem Verbstamm zur Verbindung von Teilsaetzen
[Quelle: Lekt_30 HO, S. 1]
Grundstruktur
| Teilsatz1 | Verbindung durch Konjunktion | Teilsatz2 |
| { [S2] P1 (=Verbstamm) } | 1. --cing | { [S2] P2 } |
| 2. --te |
| 3. --la |
In der Transliteration stehen Teilsaetze in Klammern. Praedikate sind durch doppelte Unterstreichung markiert. Die Teilsaetze verbindenden Konjunktionen (--cing, --te und --la) sind durch Grossschreibung hervorgehoben.
[Quelle: Lekt_30 HO, S. 1]
Einleitungsbeispiel
བོད་ཀི་ཡུལ་འདིར་མན་ངག་རོགས་པ་ཆེན་པོར་གྲགས་པ་ལ་ཡང་སེམས་སེ་དང་། ཀོང་སེ་དང་། མན་ངག་གི་སེ་ཞེས་རྣམ་པ་གསུམ་དུ་འཆད་པ་ལ། སེམས་སེ་ནི་ལྔ་བཻ་རོ་ཙ་ན་དང་། བཅུ་གསུམ་བི་མ་ལ་ལས་བྱུང་བ་ཡིན་ལ། ཀོང་སེ་ཡང་བཻ་རོ་ཙ་ན་ལས་བྱུང་བའི་མན་ངག་གོ་མན་ངག་གི་སེ་ལ་སིང་ཐིག་ཅེས་གྲགས་ཏེ། བི་མ་མི་ཏྲ་ལས་བྱུང་ཞིང་། དེའི་སོབ་མ་མྱང་ཏིང་ངེ་འཛིན་བཟང་པོ་ལས་བརྒྱུད་དེ། གསུམ་པོ་འདི་དག་ནི་བོད་ཀི་ཁམས་འདིར་ཤིན་ཏུ་དར་རོ། bod kyi yul 'dir man ngag rdzogs pa chen por grags pa la yang sems sde dang / klong sde dang / man ngag gi sde zhes rnam pa gsum du 'chad pa LA / sems sde ni lnga bai ro tsa na dang / bcu gsum bi ma la las byung ba yin LA / klong sde yang bai ro tsa na las byung ba'i man ngag go man ngag gi sde la snying thig ces grags TE / bi ma mi tra las byung ZHING / de'i slob ma myang ting nge 'dzin bzang po las brgyud DE / gsum po 'di dag ni bod kyi khams 'dir shin tu dar ro /
- G: { bod kyi yul 'dir man ngag rdzogs pa chen por grags pa la yang sems sde dang / klong sde dang / man ngag gi sde zhes rnam pa gsum du 'chad pa LA / } { sems sde ni lnga bai ro tsa na dang / bcu gsum bi ma la las byung ba yin LA / } { klong sde yang bai ro tsa na las byung ba'i man ngag go man ngag gi sde la snying thig ces grags TE / } { bi ma mi tra las byung ZHING / } { de'i slob ma myang ting nge 'dzin bzang po las brgyud DE / } { gsum po 'di dag ni bod kyi khams 'dir shin tu dar ro / }
[Quelle: Lekt_30 HO, S. 1]
Konjunktion la (--la) zur Koordination von Imperativsaetzen
[Quelle: Lekt_30 HO, S. 1]
[...] དཔེ་ཆ་ལ་སོགས་པ་ཁོད་རང་གི་ཡོ་བྱད་རྣམས་རིམ་གིས་སོས་ལ་ངའི་འདིར་ཤོག་གསུང་། [...] dpe cha la sogs pa khyod rang gi yo byad rnams rim gyis skyos la nga'i 'dir shog gsung /
- W: dpe cha: Buch. --la sogs pa: usw. khyod: du (PersPron). rang: selbst (Pron). --gi: AttrSuf. yo byad: Sache; Ding. --rnams: PlSuf. rim --gyis: der Reihe nach (Adv). skyos: herbeitragen (tdV; 4.SF). --la: und (Konj). nga: ich (PersPron). --'i: AttrSuf. 'dir: hier (Adv). shog: kommen (tmdV; 4.SF). gsung: sagen (resp.; tdV; 1.,3.SF).
- G: [...] { \<TS1:\> dpe cha la sogs pa khyod rang gi yo byad rnams O \<dO:Abs\> rim gyis \<ABmod\> skyos la \<P1:VG1;4.SF;Konj\> } { \<TS2:\> nga'i 'dir \<ABlok:PP\> shog \<P2:VG3;4.SF\> } gsung \<P3:VG1;1.SF\> /
- Ue: [Er] sagt[e]: "Bring Deine Sachen wie Buecher usw. der Reihe nach und komm hierher, zu mir!"
[Quelle: Lekt_30 HO, S. 1]
Die Konjunktionen cing, te und la zur Nebenordnung von weitgehend unabhaengigen Teilsaetzen
[Quelle: Lekt_30 HO, S. 2]
1. cing (--cing)
སྟག་ལོ་ལ་དགའ་མ་མོའི་དགོན་པ་བཏབ་ཅིང་ཆོས་རེ་དེ་བཞིན་གཤེགས་པ་དང་མཇལ། stag lo la dga' ma mo'i dgon pa btab cing chos rje de bzhin gshegs pa dang mjal /
- W: stag: Tiger. lo: Jahr. --la: im (PP). dga' ma mo: EN (Kloster). --'i: AttrSuf. dgon pa: Kloster. btab: gruenden (tdV; 2.SF). --cing: und (Konj). chos rje: NZ. de bzhin gshegs pa: PN. --dang: PP (o.O.). mjal: aufsuchen (resp.; tdV; 1.,2.,3.SF).
- G: { \<TS1:\> stag lo la \<ABtemp:PP\> dga' ma mo'i dgon pa O \<dO:Abs\> btab cing \<P1:VG1;2.SF;Konj\> } { \<TS2:\> chos rje de bzhin gshegs pa dang \<oO:PP\> mjal \<P2:VG2;2.SF\> } /
- Ue: Im Tiger-Jahr gruendete [er] das Kloster dGa' ma mo und [er] suchte den Chos rje De bzhin gshegs pa auf.
[Quelle: Lekt_30 HO, S. 2]
2. te (--te)
དེས་གླན་རྩང་ཚ་ཉི་མ་ལྕམ་ལ་བཤད་དེ། ཉི་མ་ལྕམ་གིས་རྒྱུད་ཀི་ཊིཀ་ཞིག་ཀང་མཛད་སྣང་ངོ་། des glan rtsang tsha nyi ma lcam la bshad de / nyi ma lcam gyis rgyud kyi Ti ka zhig kyang mdzad snang ngo /
- W: de: jener (DemPron). --s: KSuf. glan rtsang tsha: NZ. nyi ma lcam: PN. --la: KSuf. bshad: erklaeren (tdV; 2.,3.SF). --de: und (Konj). nyi ma lcam: PN. --gyis: KSuf. rgyud: Skt. tantra. --kyi: AttrSuf. Tiika: Kommentar; Skt. tiikaa. --zhig: IndPart. --kyang: sogar (FokPart). mdzad: machen (resp.; tdV; 1.,2.,3.SF). snang: scheinen (MV). --ngo: FinSuf.
- G: { \<TS1:\> des \<S1:Erg\> glan rtsang tsha nyi ma lcam la \<iO:Dat\> bshad de \<P1:VG1;2.SF;Konj\> / } { \<TS2:\> nyi ma lcam gyis \<S2:Erg\> rgyud kyi Tiika zhig O kyang \<dO:Abs\> mdzad snang \<P2:VG1;2.SF;MV\> ngo / }
- Ue: Jener erklaerte [es] dem Glan rtsang tsha Nyi ma lcam und es scheint, dass Nyi ma lcam sogar einen Kommentar zum Tantra verfasst hat.
[Quelle: Lekt_30 HO, S. 2]
3. la (--la)
གོང་མ་སུམ་ཅུ་ལ་ཚིག་རྒྱུད་མེད་ལ། འོག་མ་དྲུག་ལ་དབང་བཀའ་མེད་པས་ཐམས་ཅད་ལ་ཆོས་བདག་མ་བཏུབ། gong ma sum cu la tshig rgyud med la / 'og ma drug la dbang bka' med pas thams cad la chos bdag ma btub /
- W: gong ma: frueher (Adj). sum cu: dreissig (ZW). --la: KSuf. tshig [b]rgyud: Wortueberlieferung. med: neg. EV. --la: und (Konj). 'og ma: spaeter (Adj). drug: sechs (ZW). --la: KSuf. dbang: Ermaechtigung. bka': Anweisung. med pa: EV. --s: weil (Konj). thams cad: alle (IndPron). --la: bei; unter (PP). chos bdag: Herr der Lehre. ma: NegPart. btub: koennen (MV).
- G: { \<TS1:\> gong ma sum cu la \<iO:Dat\> tshig rgyud O \<S:Abs\> med la \<P1:EV;Konj\> / } { \<TS2kaus:\> 'og ma drug la \<iO:Dat\> dbang bka' O \<S:Abs\> med pas \<P2:EV;Konj\> } { \<TS3:\> thams cad la \<ABlok:PP\> chos bdag O \<dO:Abs\> ma btub \<P3:Neg;MV\> / }
- Ue: Die dreissig frueheren [Lehrer] besitzen nicht die Wortueberlieferung, und da die sechs spaeteren [Lehrer] nicht die Ermaechtigung und Anweisung besitzen, kann unter all [diesen] [keiner] als Herr der Lehre [fungieren].
[Quelle: Lekt_30 HO, S. 2]
Die Konjunktionen cing, te und la zur Subordination von Teilsaetzen
[Quelle: Lekt_30 HO, S. 3--5]
1. cing (--cing)
Temporales Verhaeltnis
ངམ་རོང་བས་དེ་ལ་ཡིག་སྣ་ཡང་བརྩམས་ཤིང་། དེ་ནས་མཆེད་པ་ལ་བདེ་མཆོག་སན་བརྒྱུད་ཟེར། ngam rdzong bas de la yig sna yang brtsams shing / de nas mched pa la bde mchog snyan brgyud zer /
- W: ngam rdzong ba: NZ. --s: KSuf. de: DemPron. --la: in Bezug auf (PP). yig: Text. sna: Sorte. --yang: sogar (FokPart). brtsams: verfassen (tdV; 2.SF). --shing: und (Konj). de nas: danach (Adv). mched pa: sich verbreiten (tmdV; 1.,2.,3.SF). --la: und (Konj). bde mchog: EN (Gottheit, Lehre, Text); Skt. (cakra)samvara. snyan brgyud: muendliche Ueberlieferung. zer: sagen; nennen (tdV; 1.,2.,3.SF).
- G: { \<TS1temp:\> ngam rdzong bas \<S1:Erg\> de la \<Erg:PP\> yig sna O yang \<dO:Abs\> brtsams shing \<P1:VG1;2.SF;Konj\> } / { \<TS2:\> de nas \<ABtemp\> mched pa la \<P2:VG6;2.SF;Konj\> } { \<TS3:\> bde mchog snyan brgyud O \<OPraed:Abs\> zer \<P3:VG1;2.SF\> } /
- Ue: rNgam rdzong ba verfasste sogar verschiedene Textbuecher zu jenen [Lehren] und danach verbreiteten [sie] sich und [sie] wurden "die muendliche Ueberlieferung [des] [Cakra]samvara" genannt.
[Quelle: Lekt_30 HO, S. 3]
གངས་ཏི་སེར་ཡང་བྱོན་ཞིང་བཞུགས། gangs ti ser yang byon zhing bzhugs /
- W: gangs ti se: ON. --r: nach (PP). --yang: auch (FokPart). byon: reisen (resp; tmdV; 2.,4.SF). --zhing: und (Konj). bzhugs: sich aufhalten (resp; tmdV; 1.,2.,3.SF).
- G: { \<TS1temp:\> gangs ti ser yang \<ABlok:PP\> byon zhing \<P1:VG3;2.SF;Konj\> } { \<TS2:\> bzhugs \<P2:VG3;2.SF\> / }
- Ue: [Er] reiste auch nach Gangs Ti se und blieb [dort].
[Quelle: Lekt_30 HO, S. 3]
Modales Verhaeltnis
གཞན་ཡང་ཅང་ཤེས་ཀི་རྟ་དང་བྱ་རོད་ལ་སོགས་པའི་སྤྲུལ་སྒྱུར་མང་པོ་བྱེད་ཅིང་ཕིན། gzhan yang cang shes kyi rta dang bya rgod la sogs pa'i sprul sgyur mang po byed cing phyin /
- W: gzhan yang: ferner; aber (Adv). cang shes: allwissend (Adj). --kyi: AttrSuf. rta: Pferd. dang: und (Konj). bya rgod: Geier. --la sogs pa: usw. --'i: AttrSuf. sprul sgyur: magische Verkoerperung. mang po: viele (IndPron). byed: machen (tdV; 1.SF). --cing: indem (Konj). phyin: gehen (tmdV; 2.SF).
- G: { \<TS1a:\> gzhan yang \<ABmod\> } { \<TS2mod:\> cang shes kyi rta dang bya rgod la sogs pa'i sprul sgyur mang po O \<dO:Abs\> byed cing \<P2:VG1;1.SF;Konj\> } { \<TS1b:\> phyin \<P1:VG3;2.SF\> / }
- Ue: Ferner bin [ich] [dorthin] gegangen, indem [ich mich] [in Form] vieler magischer Verkoerperungen erschaffen habe wie z.B. [als] allwissendes Pferd, Geier usw.
[Quelle: Lekt_30 HO, S. 3]
2. te (--te)
Temporales Verhaeltnis
དེ་ནས་རི་བོའི་དགོན་པ་བཏབ་སྟེ་དེ་ཉིད་དུ་འགྲོ་བའི་དོན་མང་པོ་མཛད་ཅིང་གཤེགས་སོ། de nas ri bo'i dgon pa btab ste de nyid du 'gro ba'i don mang po mdzad cing gshegs so /
- W: de nas: danach (Adv). ri bo: ON. --'i: AttrSuf. dgon pa: Kloster. btab: gruenden (tdV; 2.SF). --ste: und (Konj). de: DemPron. --nyid: gerade (FokPart). --du: in (PP). 'gro ba: Lebewesen. --'i: AttrSuf. don: Nutzen. mang po: viel (IndPron). mdzad: machen (resp.; tdV; 1.,2.,3.SF). --cing: und (Konj). gshegs: sterben (resp.; tmdV; 1.,2.,3.SF). --so: FinSuf.
- G: { \<TS1temp:\> de nas \<ABtemp\> ri bo'i dgon pa O \<dO:Abs\> btab ste \<P1:VG1;2.SF;Konj\> } { \<TS2temp:\> de nyid du \<ABlok:PP\> 'gro ba'i don mang po O \<dO:Abs\> mdzad cing \<P2:VG1;2.SF;Konj\> } { \<TS3:\> gshegs \<P3:VG6;2.SF\> so / }
- Ue: Danach gruendete [er] das Kloster Ri bo und bewirkte in diesem viel Nutzen fuer die Lebewesen und starb [schliesslich].
[Quelle: Lekt_30 HO, S. 4]
Modales Verhaeltnis
ཤིང་ཡོས་རྒྱལ་ཟླའི་ཉེར་དགུའི་ཉིན་གཡོག་ཅིག་ཁིད་དེ་ཕིན། [...] shing yos rgyal zla'i nyer dgu'i nyin g.yog cig khrid de phyin [...]
- W: shing: Holz. yos: Hase. rgyal: EN (Monat); Skt. pausa. zla: Monat. --'i: AttrSuf. nyer dgu: neunundzwanzig (ZW). --'i: AttrSuf. nyin: Tag. g.yog: Diener. --cig: IndPart. khrid: leiten; fuehren (tdV; 2.,4.SF). --de: indem (Konj). phyin: gehen (tmdV; 2.SF).
- G: { \<TS1a:\> shing yos rgyal zla'i nyer dgu'i nyin \<ABtemp\> } { \<TS2mod:\> g.yog cig O \<dO:Abs\> khrid de \<P2:VG1;2.SF;Konj\> } { \<TS1b:\> phyin \<P1:VG3;2.SF\> [...] }
- Ue: [Am] 29. Tag des Monats Pausa im Holz-Hasen-[Jahr] ging [er] [dorthin], indem [er] einen Diener mitfuehrte.
[Quelle: Lekt_30 HO, S. 4]
Kausales oder adversatives Verhaeltnis (seltener)
སྟག་ལོས་ནི། རོ་རེ་གདན་དུ་སོར་བ་བྱེད་ཅིང་བཞུགས་ཏེ། སོབ་གཉེར་མ་བྱས། stag los ni / rdo rje gdan du skor ba byed cing bzhugs te / slob gnyer ma byas /
- W: stag: NZ. lo: NZ. --s: KSuf. --ni: FokPart. rdo rje gdan: ON; Skt. vajraasana. --du: in (PP). skor ba: [rituelle] Umrundung. byed: machen (tdV; 1.SF). --cing: und (Konj). bzhugs: sich aufhalten (resp.; tmdV; 1.,2.,3.,4.SF). --te: aber (Konj). slob gnyer: Studium. ma: NegPart. byas: machen (tdV; 2.SF).
- G: { \<TS1temp:\> stag los ni \<S:Erg\> / rdo rje gdan du \<ABlok:PP\> skor ba O \<dO:Abs\> byed cing \<P1:VG1;1.SF;Konj\> } { \<TS2:advers\> bzhugs te \<P2:VG3;2.SF;Konj\> / } { \<TS3:\> slob gnyer O \<dO:Abs\> ma byas \<P3:Neg;VG1;2.SF\> / }
- Ue: sTag lo vollzieht (=vollzog) in Vajraasana rituelle Umrundungen, verweilte [dort], aber betrieb keine Studien.
[Quelle: Lekt_30 HO, S. 4]
3. la (--la)
Adversatives Verhaeltnis
བོད་འདིར་རོ་རེ་ཕུར་བུའི་སྒྲུབ་པ་ནི་ཤིན་ཏུ་དར་ལ། དེ་ལ་ཡང་ཁ་ཟེར་བ་དག་ཡོད་མོད་ཀི། bod 'dir rdo rje phur bu'i sgrub pa ni shin tu dar la / de la yang kha zer ba dag yod mod kyi /
- W: bod: Tibet. 'dir: hier (Adv). rdo rje phur bu: Skt. vajrakiila. --'i: AttrSuf. sgrub pa: Praxis. --ni: FokPart. shin tu: sehr (Adv). dar: verbreitet sein (tmdV; 1.,2.,3.SF). --la: und/aber (Konj). de: DemPron. --la: in; in Bezug auf (PP). --yang: FokPart. kha zer ba: Kritiker. --dag: PlSuf. yod: EV. --mod: doch; bestimmt (Suf). --kyi: Suf.
- G: { \<TS1advers:\> bod 'dir \<ABlok:PP\> rdo rje phur bu'i sgrub pa O ni \<S1:Abs\> shin tu \<ABmod\> dar la \<P1:VG6;2.SF;Konj\> / } { \<TS2:\> de la yang \<ABkonj:PP\> kha zer ba dag O \<S2:Abs\> yod mod kyi \<P2:EV;Suf;Suf\> / }
- Ue: Hier in Tibet war die Praxis des Vajrakiila weit verbreitet, und/aber in Bezug auf diese [Praxis] gab es gewiss auch Kritiker.
[Quelle: Lekt_30 HO, S. 5]
Temporales Verhaeltnis
མཁས་པའི་སེ་བོས་གླན་ལ་གསུངས་ལ། དེས་ཀང་ཀླུབས་ཇོ་སྲས་ལ་གནང་ཞིང་། དེས་ཀང་གླན་ཆོས་ཀི་དབང་ཕྱུག་ལའོ། mkhas pa'i skye bos glan la gsungs la / des kyang klubs jo sras la gnang zhing / des kyang glan chos kyi dbang phyug la'o /
- W: mkhas pa: gelehrt (Adj). --'i: AttrSuf. skye bo: Lebewesen. --s: KSuf. glan: NZ. --la: KSuf. gsungs: verkuenden (resp; tdV; 2.,4.SF). --la: und (Konj). de: DemPron. --s: KSuf. --kyang: FokPart. klubs: NZ. jo sras: NZ. --la: KSuf. gnang: geben (resp.; tdV; 1.,2.,3.SF). --zhing: und (Konj). de: DemPron. --s: KSuf. --kyang: FokPart. glan: NZ. chos kyi dbang phyug: PN. --la: KSuf. --'o: FinSuf.
- G: { \<TS1temp:\> mkhas pa'i skye bos \<S1:Erg\> glan la \<iO:Dat\> gsungs la \<P1:VG1;2.SF;Konj\> / } { \<TS2temp:\> des kyang \<S2:Erg\> klubs jo sras la \<iO:Dat\> gnang zhing \<P2:VG1;2.SF;Konj\> / } { \<TS3:\> des kyang \<S3:Erg\> glan chos kyi dbang phyug la \<iO:Dat\> 'o / }
- Ue: Der Gelehrte verkuendete [die Lehren] dem Glan und jener gab [sie] Klubs Jo sras und der [verkuendete] [sie] dem Glan Chos kyi dbang phyug.
[Quelle: Lekt_30 HO, S. 5]
Uebungen
[Aus LEK_30 UEB.pdf]
Satz 1
Tibetisch: དེ་ལ་གཡུང་སྟོན་པ་ནི་གདུང་རུས་གླན་ཡིན་ལ། འཁྲུངས་ས་ནི་ཚོང་འདུས་པ་ཡིན།
Wylie: de la g.yung ston pa ni gdung rus glan yin la / 'khrungs sa ni tshong 'dus pa yin /
Morphemanalyse:
| Tibetisch | Wylie | Wortart | Bedeutung | Grammatische Funktion |
| ----------- | ------- | --------- | ----------- | ---------------------- |
| དེ་ | de | DemPron | jener; jene(s) | ABkonj |
| ལ་ | la | PP | in Bezug auf | ABkonj:PP |
| གཡུང་སྟོན་པ་ | g.yung ston pa | NZ | gYung ston pa | S1:Abs |
| ནི་ | ni | FokPart | -- (Topikmarker) | FokPart |
| གདུང་རུས་ | gdung rus | Subst. | Familienklan | SPraed (Teil) |
| གླན་ | glan | NZ | Glan | SPraed (Apposition zu gdung rus) |
| ཡིན་ | yin | KV | sein | P1:KV |
| ལ་ | la | Konj | und (--la) | Konj |
| འཁྲུངས་ས་ | 'khrungs sa | Subst. | Geburtsort | S2:Abs |
| ནི་ | ni | FokPart | -- (Topikmarker) | FokPart |
| ཚོང་འདུས་པ་ | tshong 'dus pa | ON | Tshong 'dus pa | SPraed:Abs |
| ཡིན་ | yin | KV | sein | P2:KV |
| ། | / | -- | Satzendmarkierung | -- |
G: de la \<ABkonj:PP\> { \<TS1:\> g.yung ston pa 0 ni \<S1:Abs\> gdung rus glan 0 \<SPraed:Abs\> yin la \<P1:KV;Konj\> / } { \<TS2:\> 'khrungs sa 0 ni \<S2:Abs\> tshong 'dus pa 0 \<SPraed:Abs\> yin \<P2:KV\> / }
Ue: In Bezug auf jenen: gYung ston pa gehoerte dem Familienklan Glan an, und [sein] Geburtsort war Tshong 'dus pa.
Anmerkungen:
- Zusammengesetzter Satz mit der Konjunktion --la (hinter dem Verbstamm yin) in koordinierender (nebenordnender) Funktion. Die beiden Teilsaetze stehen in einem nebengeordneten Verhaeltnis zueinander; beide liefern biographische Angaben ueber gYung ston pa. [Quelle: Lekt_30 HO, S. 1--2, 5]
- de la: "in Bezug auf jenen" -- de (DemPron) + la (PP). Leitet haeufig einen neuen Abschnitt in hagiographischen Texten ein, der sich auf eine zuvor genannte Person bezieht. [Quelle: Lekt_29 HO, S. 5]
- g.yung ston pa (NZ) ist in Lekt_30 WL, Nr. 1 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 1]
- gdung rus ("Familienklan") ist in Lekt_30 WL, Nr. 2 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 2]
- glan (NZ) ist in Lekt_30 WL, Nr. 3 eingefuehrt. gdung rus glan bildet das zusammengesetzte Subjektspraedikat: "[sein] Familienklan [war] Glan". [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 3]
- yin la: Das Kopulaverb yin mit der koordinierenden Konjunktion --la verbindet die beiden Teilsaetze. Die Konjunktion --la steht direkt hinter dem Verbstamm (nicht hinter einem Verbalnomen). [Quelle: Lekt_30 HO, S. 1--2]
- 'khrungs sa: Kompositum aus 'khrungs (2.SF von 'khrung ba, "geboren werden", resp.; tmdV) + sa ("Ort"). Bedeutet "Geburtsort". 'khrung ba ist in Lekt_04 WL, Nr. 87 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_04 WL, Nr. 87]
- tshong 'dus pa (ON) ist in Lekt_30 WL, Nr. 4 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 4]
- ni erscheint zweimal als Topikmarker und hebt jeweils das Thema des Teilsatzes hervor (g.yung ston pa bzw. 'khrungs sa).
- Textquelle: Deb ther sngon po (Blaue Annalen) von 'Gos lo tsa ba gZhon nu dpal, Buch 8, Kap. 1 (Mar pa und seine Schueler). Engl. Uebers.: Roerich, *The Blue Annals*. [Externe Quelle: WisdomLib, Roerich Blue Annals]
- Kontext: Biographische Angaben zu gYung ston pa, einem Schueler des Bu ston: Sein Familienklan war Glan, und sein Geburtsort war Tshong 'dus pa.
[Quelle: Lekt_30 UEB, Satz 1]
Satz 2
Tibetisch: [...] རྒྱ་གར་དུ་བྱོན་ལ་པཎྜི་ཏ་གཅིག་གཉིས་ལ་གཏུགས།
Wylie: [...] rgya gar du byon la paN+Di ta gcig gnyis la gtugs /
Morphemanalyse:
| Tibetisch | Wylie | Wortart | Bedeutung | Grammatische Funktion |
| ----------- | ------- | --------- | ----------- | ---------------------- |
| རྒྱ་གར་ | rgya gar | ON | Indien | ABlok |
| དུ་ | du | PP | nach | ABlok:PP |
| བྱོན་ | byon | resp.; tmdV; 2.,4.SF | reisen; gehen | P1:VG3;2.SF |
| ལ་ | la | Konj | und (--la) | Konj |
| པཎྜི་ཏ་ | paN+Di ta | Subst. | Schriftgelehrter; Skt. pandita | oO (Teil) |
| གཅིག་གཉིས་ | gcig gnyis | ZW | ein [oder] zwei; einige wenige | Attribut (zu paN+Di ta) |
| ལ་ | la | KSuf | -- | oO:PP (bei gtugs) |
| གཏུགས་ | gtugs | tdV; 2.,3.,4.SF | sich anschliessen | P2:VG2;2.SF |
| ། | / | -- | Satzendmarkierung | -- |
Stammformen: 'byon pa -- byon pa -- 'byon pa -- byon (tmdV) [Quelle: Lekt_14 WL, Nr. 9]
Stammformen: gtug pa -- gtugs pa -- gtugs pa -- gtugs (tdV) [Quelle: Lekt_17 WL, Nr. 11]
G: [...] { \<TS1:\> rgya gar du \<ABlok:PP\> byon la \<P1:VG3;2.SF;Konj\> } { \<TS2:\> paN+Di ta gcig gnyis la \<oO:PP\> gtugs \<P2:VG2;2.SF\> / }
Ue: [...] [Er] reiste nach Indien und schloss sich ein [oder] zwei Schriftgelehrten an.
Anmerkungen:
- Zusammengesetzter Satz mit der Konjunktion --la (hinter dem Verbstamm byon) in koordinierender Funktion. Die beiden Teilsaetze beschreiben zwei aufeinanderfolgende Handlungen: die Reise nach Indien und den Anschluss an Gelehrte. [Quelle: Lekt_30 HO, S. 1--2]
- Der Satz beginnt mit [...], was auf einen vorangehenden Kontext hinweist.
- rgya gar ("Indien") ist in Lekt_06 WL eingefuehrt. [Quelle: Lekt_06 WL]
- byon (2.SF von 'byon pa, resp.; tmdV; VG3) ist die respektvolle Form von 'gro ba ("gehen; reisen"). [Quelle: Lekt_14 WL, Nr. 9]
- paN+Di ta ("Schriftgelehrter; Skt. pandita") ist in Lekt_14 WL, Nr. 31 eingefuehrt. Das '+' in paN+Di zeigt die Sanskrit-Ligatur an. [Quelle: Lekt_14 WL, Nr. 31]
- gcig gnyis ("ein [oder] zwei") ist eine idiomatische Wendung fuer "einige wenige". Die Zahlwoerter gcig ("eins") und gnyis ("zwei") stehen unverbunden nebeneinander und bilden zusammen ein Attribut zu paN+Di ta.
- gtugs (2.SF von gtug pa, tdV; VG2) bedeutet "sich andruecken; sich jmd. anschliessen". Der Satzbauplan ist: S:Erg -- oO:PP -- P. Das Subjekt ist implizit (die zuvor genannte Person), die PP paN+Di ta gcig gnyis la markiert das oblique Objekt. [Quelle: Lekt_17 WL, Nr. 11]
- Textquelle: Deb ther sngon po (Blaue Annalen) von 'Gos lo tsa ba gZhon nu dpal, Buch 8, Kap. 1 (Mar pa und seine Schueler). Engl. Uebers.: Roerich, *The Blue Annals*. [Externe Quelle: WisdomLib, Roerich Blue Annals]
- Kontext: Die betreffende Person reiste nach Indien und schloss sich ein oder zwei Gelehrten (Panditas) an. Das Fragment [...] weist auf den groesseren Erzaehlkontext hin.
[Quelle: Lekt_30 UEB, Satz 2]
Satz 3
Tibetisch: རྗེ་མར་པ་ལ་སློབ་མ་ཀ་བ་བཞིར་གྲགས་པ་ལས། མེས་རྔོག་འཚུར་གསུམ་པོས་བཤད་པའི་བཀའ་བཟུང་ལ། མི་ལས་སྒྲུབ་པའི་བཀའ་བཟུང་བ་ཡིན་ནོ།
Wylie: rje mar pa la slob ma ka ba bzhir grags pa las / mes rngog 'tshur gsum pos bshad pa'i bka' bzung la / mi las sgrub pa'i bka' bzung ba yin no /
Morphemanalyse:
| Tibetisch | Wylie | Wortart | Bedeutung | Grammatische Funktion |
| ----------- | ------- | --------- | ----------- | ---------------------- |
| རྗེ་ | rje | NZ | rJe (Herr; Ehrentitel) | Attribut |
| མར་པ་ | mar pa | NZ | Mar pa | iO (Possessor) |
| ལ་ | la | KSuf | -- | iO:Dat ("bei") |
| སློབ་མ་ | slob ma | Subst. | Schueler | S1 (Teil) |
| ཀ་བ་ | ka ba | Subst. | Pfeiler; Saeule | ArtErg (metaphorisch) |
| བཞི་ | bzhi | ZW | vier | Attribut (zu ka ba) |
| ར་ | -r | PP | als | ArtErg:PP |
| གྲགས་པ་ | grags pa | tmdV; 1.,2.,3.SF + NomSuf | bekannt sein | P1:VG6;2.SF |
| ལས་ | las | PP | aus; unter | PP |
| མེས་ | mes | NZ | Mes | S2:Erg (Teil) |
| རྔོག་ | rngog | NZ | rNgog | S2:Erg (Teil) |
| འཚུར་ | 'tshur | NZ | 'Tshur | S2:Erg (Teil) |
| གསུམ་པོ་ | gsum po | ZW + DetSuf | die drei | S2:Erg (Apposition) |
| ས་ | -s | KSuf | -- | S2:Erg |
| བཤད་པ་ | bshad pa | tdV; 2.,3.SF + NomSuf | erklaeren; darlegen | Attribut (zu bka') |
| འི་ | 'i | AttrSuf | -- | Genitivmarkierung |
| བཀའ་ | bka' | Subst. | Unterweisung; Rede (resp.) | dO:Abs |
| བཟུང་ | bzung | tdV; 2.SF | ergreifen; halten | P2:VG1;2.SF |
| ལ་ | la | Konj | und (--la) | Konj |
| མི་ལ་ | mi la | NZ | Mi la | S3:Erg |
| ས་ | -s | KSuf | -- | S3:Erg |
| སྒྲུབ་པ་ | sgrub pa | Subst. | Praxis; Vollziehung | Attribut (zu bka') |
| འི་ | 'i | AttrSuf | -- | Genitivmarkierung |
| བཀའ་ | bka' | Subst. | Unterweisung; Rede (resp.) | dO:Abs |
| བཟུང་བ་ | bzung ba | tdV; 2.SF + NomSuf | ergreifen; halten | P3:VG1;2.SF |
| ཡིན་ | yin | KV | sein | HV |
| ནོ་ | no | FinSuf | -- | FinSuf |
Stammformen: grags pa -- grags pa -- grags pa (tmdV) [Quelle: Lekt_19 WL, Nr. 39]
Stammformen: 'chad pa -- bshad pa -- bshad pa -- shod (tdV) [Quelle: Lekt_11 WL, Nr. 22]
Stammformen: 'dzin pa -- bzung ba -- gzung ba -- zung(s) (tdV) [Quelle: Lekt_15 WL, Nr. 34]
G: { \<TS1:\> rje mar pa la \<iO:Dat\> slob ma ka ba bzhir \<ArtErg:PP\> grags pa las \<P1:VG6;2.SF;PP\> / } { \<TS2:\> mes rngog 'tshur gsum pos \<S2:Erg\> bshad pa'i bka' 0 \<dO:Abs\> bzung la \<P2:VG1;2.SF;Konj\> / } { \<TS3:\> mi las \<S3:Erg\> sgrub pa'i bka' 0 \<dO:Abs\> bzung ba yin \<P3:VG1;2.SF;HV\> no / }
Ue: Unter [den Schuelern], die bei rJe Mar pa als die "vier Saeulen unter den Schuelern" bekannt waren, bewahrten die drei -- Mes, rNgog [und] 'Tshur -- die Unterweisung der Darlegung [d.h. die exegetische Tradition], und Mi la bewahrte die Unterweisung der Praxis [d.h. die meditative Tradition].
Anmerkungen:
- Komplexer zusammengesetzter Satz mit drei Teilsaetzen. TS1 bildet den Rahmen (Angabe der Gruppe), TS2 und TS3 sind durch die Konjunktion --la (nach bzung) koordiniert. [Quelle: Lekt_30 HO, S. 1--2]
- rje mar pa: rJe ("Herr") als Ehrentitel vor Mar pa. Mar pa (NZ) ist in Lekt_22 WL, Nr. 6 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_22 WL, Nr. 6]
- slob ma ka ba bzhir grags pa: "als vier Pfeiler unter den Schuelern bekannt". ka ba ("Pfeiler; Saeule") wird metaphorisch verwendet fuer die vier wichtigsten Schueler. bzhir = bzhi + -r (PP: "als vier"). grags pa (tmdV; VG6) = "bekannt sein". [Quelle: Lekt_19 WL, Nr. 39; Lekt_07 WL, Nr. 32]
- las als Postposition: "aus; unter" -- verweist auf die Auswahl aus der Gruppe der vier "Pfeiler-Schueler". Vgl. Lekt_29 HO, S. 5--6: --las als PP "aus; unter". [Quelle: Lekt_29 HO, S. 5--6]
- mes (NZ), rngog (NZ) und 'tshur (NZ) sind in Lekt_30 WL, Nr. 5, 6 und 7 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 5--7]
- gsum pos: gsum ("drei") + po (DetSuf; verstaerkend bei Rueckverweis auf bekannte Gruppe) + -s (Ergativsuffix). Die drei (Mes, rNgog, 'Tshur) bilden das Ergativsubjekt. [Quelle: Lekt_16 WL]
- bshad pa'i bka': "Unterweisung der Darlegung/Erklaerung" -- bshad pa (2.SF von 'chad pa, tdV, "erklaeren") als Nomen + 'i (AttrSuf) + bka' ("Unterweisung; Rede", resp.). [Quelle: Lekt_11 WL, Nr. 22; Lekt_08 WL]
- bzung (2.SF von 'dzin pa, tdV; VG1) = "ergreifen; halten". Im Kontext von bka' bzung: "die Unterweisung aufrechterhalten/bewahren". [Quelle: Lekt_15 WL, Nr. 34]
- mi la (NZ) ist in Lekt_30 WL, Nr. 8 eingefuehrt. Gemeint ist Mi la ras pa (Milarepa). [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 8]
- sgrub pa'i bka': "Unterweisung der Praxis" -- sgrub pa ("Praxis; Vollziehung") + 'i (AttrSuf) + bka'. Die Unterscheidung zwischen bshad pa'i bka' (Darlegungs-Linie) und sgrub pa'i bka' (Praxis-Linie) ist ein wichtiger Topos in der bKa' brgyud-Hagiographie.
- bzung ba yin no: Perfekt, Formbildung 1: bzung (2.SF) + ba (NomSuf) + yin (HV) + no (FinSuf). [Quelle: Lekt_25 HO, S. 1]
- Textquelle: Deb ther sngon po (Blaue Annalen) von 'Gos lo tsa ba gZhon nu dpal, Buch 8, Kap. 1 (Mar pa und seine Schueler). Engl. Uebers.: Roerich, *The Blue Annals*. [Externe Quelle: WisdomLib, Roerich Blue Annals]
- Kontext: Der beruehmte Ausspruch ueber die 'vier Pfeiler' unter den Schuelern Mar pas: Mes, rNgog und 'Tshur hielten die Darlegungs-Unterweisung aufrecht, waehrend Mi la (Milarepa) die Praxis-Unterweisung bewahrte.
[Quelle: Lekt_30 UEB, Satz 3]
Satz 4
Tibetisch: ཁྱོད་རང་གཙང་ན་ཡར་སོང་ལ་གཞུང་སློབས།
Wylie: khyod rang gtsang na yar song la gzhung slobs /
Morphemanalyse:
| Tibetisch | Wylie | Wortart | Bedeutung | Grammatische Funktion |
| ----------- | ------- | --------- | ----------- | ---------------------- |
| ཁྱོད་རང་ | khyod rang | PersPron | du selbst | S:Erg |
| གཙང་ | gtsang | ON | gTsang | ABlok |
| ན་ | na | PP | in; nach | ABlok:PP |
| ཡར་ | yar | Adv | hinauf; nach oben | ABdir |
| སོང་ | song | tmdV; 4.SF | geh! | P1:VG3;4.SF |
| ལ་ | la | Konj | und (--la) | Konj |
| གཞུང་ | gzhung | Subst. | Haupt[text]; Lehre | dO:Abs |
| སློབས་ | slobs | tdV; 4.SF | lerne! / lehre! | P2:VG1;4.SF |
| ། | / | -- | Satzendmarkierung | -- |
Stammformen: 'gro ba -- song ba / phyin pa -- 'gro ba -- song (tmdV) [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 10; Lekt_06 WL]
Stammformen: slob pa -- bslabs pa -- bslab pa -- slobs (tdV) [Quelle: Lekt_12 WL, Nr. 30]
G: khyod rang \<S:Erg\> { \<TS1:\> gtsang na \<ABlok:PP\> yar \<ABdir\> song la \<P1:VG3;4.SF;Konj\> } { \<TS2:\> gzhung 0 \<dO:Abs\> slobs \<P2:VG1;4.SF\> / }
Ue: Geh du selbst hinauf nach gTsang und studiere [dort] die [Lehr]texte!
Anmerkungen:
- Koordinierter Imperativsatz mit der Konjunktion --la (hinter dem Verbstamm song) zur Verbindung zweier Imperativbefehle. Vgl. das HO-Beispiel: [...] skyos la [...] shog gsung ("Bring [die Sachen] und komm her!"). [Quelle: Lekt_30 HO, S. 1]
- khyod rang: "du selbst" -- khyod (PersPron, 2. Pers.) + rang ("selbst") als Verstaerkung. Die in der UEB-PDF erscheinende Schreibung ཁྟོད ist eine Phantom-ta-OCR-Variante; der korrekte Wylie ist khyod. khyod ist in Lekt_09 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_09 WL]
- gtsang (ON, "gTsang") ist eine der beiden zentraltibetischen Provinzen, eingefuehrt in Lekt_06 WL, Nr. 31. [Quelle: Lekt_06 WL, Nr. 31]
- yar ("hinauf; nach oben") ist in Lekt_30 WL, Nr. 9 eingefuehrt. In geographischem Kontext bedeutet yar "stromaufwaerts", da gTsang westlich von dBus liegt und "oben" als "stromaufwaerts am Tsangpo" verstanden wird. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 9]
- song (4.SF = Imperativ von 'gro ba, tmdV; VG3) = "geh!". Die UEB-PDF zeigt die Schreibvariante སྟོང (stong) mit Phantom-ta; der korrekte Wylie laut WL Nr. 10 ist song. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 10]
- la als koordinierende Konjunktion verbindet die beiden Imperativsaetze. [Quelle: Lekt_30 HO, S. 1]
- gzhung ("Mitte; Haupt[sache]; Haupt[text]") ist in Lekt_04 WL eingefuehrt. Im Kontext von Studienauftraegen: "die (grundlegenden Lehr-)Texte". [Quelle: Lekt_04 WL]
- slobs (4.SF von slob pa, tdV; VG1) = "lernen; lehren". Im Imperativkontext mit gzhung als dO: "lerne die Texte!" (oder: "studiere die Texte!"). [Quelle: Lekt_12 WL, Nr. 30]
- Textquelle: Deb ther sngon po (Blaue Annalen) von 'Gos lo tsa ba gZhon nu dpal, Buch 8, Kap. 1 (Mar pa und seine Schueler). Engl. Uebers.: Roerich, *The Blue Annals*. [Externe Quelle: WisdomLib, Roerich Blue Annals]
- Kontext: Ein Imperativbefehl: Die angesprochene Person soll hinauf nach gTsang reisen und dort die Lehrtexte studieren.
[Quelle: Lekt_30 UEB, Satz 4]
Satz 5
Tibetisch: འདི་ཉིད་དུ་སྡོད་ལ་ཉོན་གསུང [...]
Wylie: 'di nyid du sdod la nyon gsung [...]
Morphemanalyse:
| Tibetisch | Wylie | Wortart | Bedeutung | Grammatische Funktion |
| ----------- | ------- | --------- | ----------- | ---------------------- |
| འདི་ | 'di | DemPron | hier; diese(r/s) | ABlok (Teil) |
| ཉིད་ | nyid | FokPart | eben; gerade | FokPart (verstaerkend) |
| དུ་ | du | PP | in; an | ABlok:PP |
| སྡོད་ | sdod | tmdV; 1.,4.SF | verweilen; bleiben | P1:VG3;4.SF |
| ལ་ | la | Konj | und (--la) | Konj |
| ཉོན་ | nyon | tdV; 4.SF | hoere!; studiere! | P2:VG1;4.SF |
| གསུང་ | gsung | resp.; tdV; 1.,3.SF | sagen | P3:VG1;1.SF |
| [...] | [...] | -- | [Satz unvollstaendig] | -- |
Stammformen: sdod pa -- bsdad pa -- bsdad pa -- sdod (tmdV) [Quelle: Lekt_14 WL, Nr. 24, Nr. 26]
Stammformen: nyan pa -- mnyan pa -- mnyan pa -- nyon (tdV) [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 11; Lekt_29 WL, Nr. 9; grammatik/verben.md, Zeile 182] [Externe Quelle: Hill 2010; Rangjung Yeshe Wiki]
Stammformen: gsung ba -- gsungs pa -- gsung ba -- gsungs (tdV) [Quelle: Lekt_08 WL]
G: { \<TS1:\> 'di nyid du \<ABlok:PP\> sdod la \<P1:VG3;4.SF;Konj\> } { \<TS2:\> nyon \<P2:VG1;4.SF\> } gsung \<P3:VG1;1.SF\> [...] /
Ue: "[Bleib] eben hier und hoere [die Lehre]!", sagte [er]. [...]
Anmerkungen:
- Koordinierter Imperativsatz innerhalb einer direkten Rede: Die Konjunktion --la (hinter dem Verbstamm sdod) verbindet zwei Imperativsaetze ("bleibe hier" und "hoere!"). Das Rahmenverb gsung ("sagen", resp.) leitet die woertliche Rede ein bzw. schliesst sie ab. Vgl. das HO-Beispiel: [...] skyos la [...] shog gsung ("Bring [die Sachen] und komm her!", sagte [er]). [Quelle: Lekt_30 HO, S. 1]
- 'di nyid du: "genau hier; eben hier" -- 'di (DemPron "hier/dieser") + nyid (FokPart "eben; gerade") + du (PP "in/an"). Die Fokuspartikel nyid verstaerkt die deiktische Bestimmung: "genau an diesem Ort". Vgl. Lekt_14 UEB: khyed 'di nyid du bzhugs shig ("Haltet euch genau hier auf!"). [Quelle: Lekt_18 WL, Nr. 29; Lekt_14 UEB]
- sdod (4.SF = Imperativ von sdod pa, tmdV; VG3) = "bleibe!; verweile!". Eingefuehrt in Lekt_14 WL, Nr. 26. [Quelle: Lekt_14 WL, Nr. 26]
- la als koordinierende Konjunktion zwischen Imperativsaetzen. [Quelle: Lekt_30 HO, S. 1]
- nyon (4.SF = Imperativ von nyan pa, tdV) = "hoere!; studiere!". Die WL fuehrt nyon als 4.SF auf. Eingefuehrt in Lekt_30 WL, Nr. 11. Vgl. auch Lekt_29 WL, Nr. 9 (nyan pa, tdV; 1.SF). [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 11; Lekt_29 WL, Nr. 9]
- gsung (1./3.SF von gsung ba, resp.; tdV; VG1) = "sagen" (resp.). Als Rahmenverb schliesst es die woertliche Rede ab. Die vorliegende Form ist 1.SF (Praesens). [Quelle: Lekt_08 WL]
- Der Satz endet mit [...], was darauf hinweist, dass der Kontext im Original weitergeht.
- Das direkte Objekt von nyon ist implizit und muss aus dem Kontext erschlossen werden (vermutlich "die Lehre" oder "die Unterweisungen").
- Das Subjekt der Imperativsaetze (die angesprochene Person) und das Subjekt von gsung (der Sprechende) sind implizit und muessen aus dem Erzaehlkontext bestimmt werden.
- Textquelle: Deb ther sngon po (Blaue Annalen) von 'Gos lo tsa ba gZhon nu dpal, Buch 8, Kap. 1 (Mar pa und seine Schueler). Engl. Uebers.: Roerich, *The Blue Annals*. [Externe Quelle: WisdomLib, Roerich Blue Annals]
- Kontext: In einer direkten Rede wird jemandem befohlen, genau hier zu bleiben und die Lehre zu hoeren. Das Fragment [...] weist auf einen fortgesetzten Kontext hin.
[Quelle: Lekt_30 UEB, Satz 5]
Satz 6
Tibetisch: དེ་དག་གི་བར་སྐབས་སུ་ཡང་བྱང་སེམས་ཟླ་རྒྱལ་གི་ཉེ་གནས་མཛད་ཅིང་ཆོས་མང་དུ་གསན།
Wylie: de dag gi bar skabs su yang byang sems zla rgyal gi nye gnas mdzad cing chos mang du gsan /
Morphemanalyse:
| Tibetisch | Wylie | Wortart | Bedeutung | Grammatische Funktion |
| ----------- | ------- | --------- | ----------- | ---------------------- |
| དེ་དག་ | de dag | DemPron + PlSuf | jene (Pl.) | Attribut (Possessor) |
| གི་ | gi | AttrSuf | -- | Genitivmarkierung |
| བར་སྐབས་ | bar skabs | Subst. | Zwischenzeit | ABtemp (Kopf) |
| སུ་ | su | PP | in; waehrend | ABtemp:PP |
| ཡང་ | yang | FokPart | auch | Fokuspartikel |
| བྱང་སེམས་ | byang sems | NZ | Byang [chub] sems [dpa'] | Attribut (Possessor) |
| ཟླ་རྒྱལ་ | zla rgyal | PN | Zla [ba] rgyal [mtshan] | iO:Dat (Kopf) |
| གི་ | gi | AttrSuf | -- | Genitivmarkierung |
| ཉེ་གནས་ | nye gnas | Subst. / NZ | Begleiter | dO:Abs |
| མཛད་ | mdzad | resp.; tdV; 1.,2.,3.SF | machen; ausueben | P1:VG1;2.SF |
| ཅིང་ | cing | Konj | und (koordinierend) | Konj |
| ཆོས་ | chos | Subst. | Lehre(n) | dO:Abs (Kopf) |
| མང་དུ་ | mang du | IndPron + PP | viele | Attribut (zu chos) |
| གསན་ | gsan | resp.; tdV; 1.,2.,3.SF | hoeren; studieren | P2:VG1;2.SF |
Stammformen: mdzad pa -- mdzad pa -- mdzad pa -- mdzod (tdV) [Quelle: Lekt_11 WL, Nr. 9; Lekt_08 WL, Nr. 22]
Stammformen: gsan pa -- gsan pa -- gsan pa -- gson (tdV) [Quelle: Lekt_18 WL; Lekt_15 UEB]
G: { \<TS1:\> de dag gi bar skabs su yang \<ABtemp:PP;FokPart\> byang sems zla rgyal gi \<iO:Dat\> nye gnas 0 \<dO:Abs\> mdzad cing \<P1:VG1;2.SF;Konj\> } { \<TS2:\> chos mang du 0 \<dO:Abs\> gsan \<P2:VG1;2.SF\> / }
Ue: In der Zwischenzeit jener [Ereignisse] diente [er] auch als Begleiter des Byang sems Zla rgyal und studierte viele Lehren.
Anmerkungen:
- Zusammengesetzter Satz mit der koordinierenden Konjunktion -cing hinter dem Verbstamm mdzad, die zwei nebengeordnete Teilsaetze verbindet ("und"). Die Konstruktion folgt dem Schema aus Lekt_30 HO, S. 1--2: { [S2] P1 (=Verbstamm) } -cing { [S2] P2 }. [Quelle: Lekt_30 HO, S. 1--2]
- de dag gi bar skabs su: "in der Zwischenzeit jener [Ereignisse]". de dag (DemPron + PlSuf) bezieht sich auf die zuvor geschilderten Ereignisse. bar skabs ("Zwischenzeit") ist in Lekt_30 WL, Nr. 12 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 12]
- yang ("auch") als Fokuspartikel betont, dass die folgenden Taetigkeiten zusaetzlich zu anderen stattfanden.
- byang sems ist eine Kurzform fuer byang chub sems dpa' (Skt. bodhisattva; hier als NZ), eingefuehrt in Lekt_30 WL, Nr. 13. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 13]
- zla rgyal ist eine Kurzform fuer Zla ba rgyal mtshan (PN), eingefuehrt in Lekt_30 WL, Nr. 14. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 14]
- nye gnas ("Begleiter") ist in Lekt_30 WL, Nr. 15 eingefuehrt. Die Konstruktion nye gnas mdzad bedeutet woertlich "den Begleiter machen" = "als Begleiter dienen". [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 15]
- gi nach zla rgyal: Genitivsuffix. Die Konstruktion zla rgyal gi nye gnas mdzad ist woertlich "den Begleiter des Zla rgyal ausueben" = "als Begleiter des Zla rgyal dienen". Die Genitivlesart ist hier idiomatisch eindeutig.
- chos mang du gsan: "viele Lehren studieren/hoeren". gsan ist die respektvolle Form von nyan pa ("hoeren; studieren"). Das implizite Subjekt ist dasselbe wie im ersten Teilsatz. [Quelle: Lekt_18 WL; Lekt_15 UEB]
- mdzad (resp. fuer byed pa, tdV; VG1) und gsan (resp. fuer nyan pa, tdV; VG1) stehen beide in der 2.SF (Vergangenheit). Das Subjekt beider Teilsaetze ist implizit und steht im Ergativ.
- Textquelle: Deb ther sngon po (Blaue Annalen) von 'Gos lo tsa ba gZhon nu dpal, Buch 8, Kap. 1 (Mar pa und seine Schueler). Engl. Uebers.: Roerich, *The Blue Annals*. [Externe Quelle: WisdomLib, Roerich Blue Annals]
- Kontext: In der Zwischenzeit diente die betreffende Person als Begleiter des Byang sems Zla rgyal und studierte viele Lehren.
[Quelle: Lekt_30 UEB, Satz 6]
Satz 7
Tibetisch: དེ་ནས་བརྒྱུད་དེ་ལུགས་སྣ་ཚོགས་སུ་གྱུར་ཅིང་ཤིན་ཏུ་དར་རོ།
Wylie: de nas brgyud de lugs sna tshogs su gyur cing shin tu dar ro /
Morphemanalyse:
| Tibetisch | Wylie | Wortart | Bedeutung | Grammatische Funktion |
| ----------- | ------- | --------- | ----------- | ---------------------- |
| དེ་ནས་ | de nas | Adv | danach; daraufhin | ABtemp |
| བརྒྱུད་ | brgyud | tdV; 2.,3.SF | ueberliefern; sich verbreiten | P1:VG1;2.SF |
| དེ་ | de | Konj | und; danach (-te Allomorph) | Konj |
| ལུགས་ | lugs | Subst. | Art; Tradition | ResBest (Kopf) |
| སྣ་ཚོགས་ | sna tshogs | Adj | verschiedene(r); mancherlei | Attribut (zu lugs) |
| སུ་ | su | PP | zu; in | ResBest:PP |
| གྱུར་ | gyur | tmdV; 2.SF | werden; sich verwandeln | P2:VG6;2.SF |
| ཅིང་ | cing | Konj | und (koordinierend) | Konj |
| ཤིན་ཏུ་ | shin tu | Adv | sehr | ABmod |
| དར་ | dar | tmdV; 1.,2.,3.SF | sich ausbreiten; sich verbreiten | P3:VG6;2.SF |
| རོ་ | ro | FinSuf | -- | Finalsuffix |
Stammformen: 'gyur ba -- gyur ba -- 'gyur ba (tmdV) [Quelle: Lekt_20 WL, Nr. 6]
Stammformen: dar ba -- dar ba -- dar ba (tmdV) [Quelle: Lekt_27 WL, Nr. 14]
Stammformen (brgyud): brgyud pa -- brgyud pa -- brgyud pa -- -- (tmdV; VG6) [Quelle: grammatik/verben.md, Zeile 54; Lekt_33] [Externe Quelle: Hill 2010 -- brgyud pa als intransitives Verb mit der Bedeutung "weitergegeben werden; ueberliefert werden", alle SF gleich]. Anmerkung: Hill 2010 unterscheidet das transitive rgyud pa ("kausativ ueberliefern") vom intransitiven brgyud pa ("ueberliefert werden"); im vorliegenden Kontext (Subjekt: implizite Lehre/Tradition; passivische Lesart) liegt das intransitive brgyud pa vor.
G: de nas \<ABtemp\> { \<TS1temp:\> brgyud de \<P1:VG1;2.SF;Konj\> } { \<TS2:\> lugs sna tshogs su \<ResBest:PP\> gyur cing \<P2:VG6;2.SF;Konj\> } { \<TS3:\> shin tu \<ABmod\> dar \<P3:VG6;2.SF\> ro / }
Ue: Danach wurde [die Lehre] ueberliefert, [sie] wandelte sich zu verschiedenen Traditionen und breitete sich sehr aus.
Anmerkungen:
- Dreiteiliger zusammengesetzter Satz mit zwei verschiedenen Konjunktionen: -de nach brgyud (Allomorph von -te; Konj hinter Verbstamm) und -cing nach gyur (Konj hinter Verbstamm). Beide verbinden die Teilsaetze koordinierend. [Quelle: Lekt_30 HO, S. 1--4]
- de nas ("danach; daraufhin") leitet die zeitliche Abfolge ein.
- brgyud (2.SF von rgyu ba / brgyud pa, tdV): "ueberliefern; weitergeben". Im Kontext der Lehrueberlieferung: "[die Lehre] wurde [weiter]ueberliefert". Das Subjekt ist implizit (die zuvor erwaehnte Lehrtradition). [Quelle: Lekt_17 UEB]
- -de ist das Allomorph von -te nach den Suffixbuchstaben -d (hier: brgyud endet auf -d). [Quelle: Lekt_30 HO, S. 1]
- lugs sna tshogs su gyur: "wurde zu verschiedenen Traditionen". lugs ("Art; Tradition") ist in Lekt_20 WL, Nr. 1 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_20 WL, Nr. 1]. sna tshogs ("verschiedene(r); mancherlei") ist in Lekt_30 WL, Nr. 16 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 16]
- gyur (2.SF von 'gyur ba, tmdV; VG6): "werden; sich wandeln". Die Resultatsbestimmung (ResBest) lugs sna tshogs su gibt an, wozu etwas wird. [Quelle: Lekt_20 WL, Nr. 6]
- shin tu ("sehr") ist ein Adverb der Intensitaet, modifiziert dar. [Quelle: Lekt_16 WL]
- dar (tmdV; VG6): "sich ausbreiten; sich verbreiten". Alle drei Stammformen sind identisch. [Quelle: Lekt_27 WL, Nr. 14]
- ro ist ein Finalsuffix. Vgl. die fast parallele Konstruktion im HO-Beispiel von Lekt_30: "gsum po 'di dag ni bod kyi khams 'dir shin tu dar ro" ("[Diese] drei breiteten sich hier in Tibet sehr aus"). [Quelle: Lekt_30 HO, S. 1]
- Textquelle: Deb ther sngon po (Blaue Annalen) von 'Gos lo tsa ba gZhon nu dpal, Buch 4, Kap. 1 (Die Lam 'bras-Ueberlieferung). Engl. Uebers.: Roerich, *The Blue Annals*. [Externe Quelle: WisdomLib, Roerich Blue Annals]
- Kontext: Nach der Ueberlieferung wandelte sich die Lehre zu verschiedenen Traditionen und breitete sich sehr aus.
[Quelle: Lekt_30 UEB, Satz 7]
Satz 8
Tibetisch: དེ་ནས་སི་ཚང་དུ་ཉམས་ལེན་མཛད་ཅིང་བཞུགས་པ་ན་སློབ་དཔོན་ཤ་སྟོན་གིས་མི་བཏང་བྱུང་བས་ཕུ་ཐང་དུ་བྱོན [...]
Wylie: de nas si tshang du nyams len mdzad cing bzhugs pa na slob dpon sha ston gis mi btang byung bas phu thang du byon [...]
Morphemanalyse:
| Tibetisch | Wylie | Wortart | Bedeutung | Grammatische Funktion |
| ----------- | ------- | --------- | ----------- | ---------------------- |
| དེ་ནས་ | de nas | Adv | danach; daraufhin | ABtemp |
| སི་ཚང་ | si tshang | ON | sKyi tshang | ABlok (Kopf) |
| དུ་ | du | PP | in; an | ABlok:PP |
| ཉམས་ལེན་ | nyams len | Subst. | Praxis | dO:Abs |
| མཛད་ | mdzad | resp.; tdV; 1.,2.,3.SF | machen; ausueben | P1a:VG1;2.SF |
| ཅིང་ | cing | Konj | und (koordinierend) | Konj |
| བཞུགས་པ་ | bzhugs pa | resp.; tmdV; 1.,2.,3.SF + NomSuf | verweilen; sich aufhalten | P1b:VG3;2.SF |
| ན་ | na | Konj | als; waehrend | Konj |
| སློབ་དཔོན་ | slob dpon | Subst. / NZ | Lehrmeister | S:Erg (Kopf) |
| ཤ་སྟོན་ | sha ston | NZ | Sha ston | S:Erg (Apposition) |
| གིས་ | gis | KSuf | -- | Ergativmarkierung |
| མི་ | mi | Subst. | Bote; Person | dO:Abs |
| བཏང་ | btang | tdV; 2.SF | schicken; senden | P2:VG1;2.SF |
| བྱུང་བ་ | byung ba | tmdV; 2.SF | kommen; eintreffen | HV |
| ས་ | -s | Konj | als; weil (--°s) | Konj |
| ཕུ་ཐང་ | phu thang | ON | Phu thang | ABlok (Kopf) |
| དུ་ | du | PP | nach | ABlok:PP |
| བྱོན་ | byon | resp.; tmdV; 2.,4.SF | reisen; gehen | P3:VG3;2.SF |
Stammformen: mdzad pa -- mdzad pa -- mdzad pa -- mdzod (tdV) [Quelle: Lekt_11 WL, Nr. 9]
Stammformen: bzhugs pa -- bzhugs pa -- bzhugs pa -- bzhugs (tmdV) [Quelle: Lekt_14 WL, Nr. 18]
Stammformen: gtong ba -- btang ba -- gtang ba -- thong (tdV) [Quelle: Lekt_19 WL, Nr. 19; Lekt_22 UEB]
Stammformen: 'byung ba -- byung ba -- 'byung ba (tmdV) [Quelle: Lekt_08 WL]
Stammformen: 'byon pa -- byon pa -- 'byon pa -- byon (tmdV) [Quelle: Lekt_14 WL, Nr. 9]
G: de nas \<ABtemp\> { \<TS1temp:\> si tshang du \<ABlok:PP\> { \<TS1a:\> nyams len 0 \<dO:Abs\> mdzad cing \<P1a:VG1;2.SF;Konj\> } bzhugs pa na \<P1b:VG3;2.SF;Konj\> } { \<TS2kaus:\> slob dpon sha ston gis \<S2:Erg\> mi 0 \<dO:Abs\> btang byung bas \<P2:VG1;2.SF;HV;Konj\> } { \<TS3:\> phu thang du \<ABlok:PP\> byon \<P3:VG3;2.SF\> } [...]
Ue: Als [er] danach in sKyi tshang Praxis ausuebte und verweilte, schickte Lehrmeister Sha ston einen Boten, weshalb [er] nach Phu thang reiste.
Anmerkungen:
- Komplexer zusammengesetzter Satz mit drei Ebenen der Satzverbindung: (1) -cing verbindet mdzad und bzhugs (gleichzeitige Handlungen: "Praxis ausueben und verweilen"); (2) -pa na (Konj hinter Verbalnomen) verbindet den zeitlichen Hintergrund mit dem Hauptereignis ("als ... verweilte"); (3) --°s (hier: -s nach byung ba) verbindet den Grund ("weil ein Bote geschickt wurde") mit der Folge ("reiste nach Phu thang"). [Quelle: Lekt_30 HO, S. 1--4; Lekt_29 HO, S. 2--4]
- si tshang: Die UEB-PDF zeigt eindeutig སི་ཚང (si tshang), waehrend die WL Nr. 17 sKyi tshang (སྐྱི་ཚང) auffuehrt. Bestaetigt: Es liegt eine editorische Schreibvariante / Druckabweichung in der UEB-PDF vor (si tshang = vereinfachte Schreibung ohne Subskript-ya). Die WL-Form skyi tshang ist die kanonische Form (sKyi tshang ist ein Tal in Khams). Im Folgenden wird die WL-Form skyi tshang verwendet. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 17]
- nyams len ("Praxis") ist in Lekt_30 WL, Nr. 18 eingefuehrt. Die Wendung nyams len mdzad bedeutet "[meditative] Praxis ausueben". [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 18]
- mdzad cing bzhugs pa na: Die Konjunktion -cing verbindet mdzad und bzhugs als zwei gleichzeitige Taetigkeiten. bzhugs pa na bildet dann mit dem Nominalsuffix -pa und der Konjunktion -na den temporalen Teilsatz ("als [er] ... verweilte"). [Quelle: Lekt_30 HO, S. 2--3; Lekt_29 HO, S. 4]
- slob dpon ("Lehrmeister") ist in Lekt_08 WL, Nr. 36 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_08 WL, Nr. 36]
- sha ston (NZ) ist in Lekt_30 WL, Nr. 19 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 19]
- mi btang: "einen Boten/Menschen schicken". mi ("Person; Bote") + btang (2.SF von gtong ba, tdV; VG1: "schicken; senden"). [Quelle: Lekt_19 WL, Nr. 19]
- byung bas: byung als Hilfsverb (HV) nach btang drueckt aus, dass die Handlung auf das Subjekt des uebergeordneten Satzes zukommt ("es kam [ein Bote] geschickt"). Die Konjunktion --°s (hier: -s nach byung ba) gibt den Grund an ("weil/als"). [Quelle: Lekt_29 HO, S. 2--3]
- phu thang (ON) ist in Lekt_30 WL, Nr. 20 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 20]
- byon (resp. fuer 'gro ba, tmdV; VG3): "reisen; gehen", 2.SF. [Quelle: Lekt_14 WL, Nr. 9]
- Der Satz endet mit [...], was auf einen laengeren Kontext hinweist.
- Textquelle: Deb ther sngon po (Blaue Annalen) von 'Gos lo tsa ba gZhon nu dpal, Buch 8, Kap. 1 (Mar pa und seine Schueler). Engl. Uebers.: Roerich, *The Blue Annals*. [Externe Quelle: WisdomLib, Roerich Blue Annals]
- Kontext: Waehrend die betreffende Person in sKyi tshang Meditationspraxis ausuebte, schickte der Lehrmeister Sha ston einen Boten, woraufhin sie nach Phu thang reiste.
[Quelle: Lekt_30 UEB, Satz 8]
Satz 9
Tibetisch: དཔལ་ཆེན་ཆོས་ཡེས་ནི། ཆོས་རེ་ལ་གདམས་པ་རྣམས་གསན་ཞིང་གཟིམས་གཡོག་ཡུན་རིང་དུ་མཛད།
Wylie: dpal chen chos yes ni / chos re la gdams pa rnams gsan zhing gzims g.yog yun ring du mdzad /
Morphemanalyse:
| Tibetisch | Wylie | Wortart | Bedeutung | Grammatische Funktion |
| ----------- | ------- | --------- | ----------- | ---------------------- |
| དཔལ་ཆེན་ | dpal chen | NZ | dPal chen | S:Erg (Kopf, Teil 1) |
| ཆོས་ཡེས་ | chos yes | PN | Chos [kyi] ye [shes] | S:Erg (Kopf, Teil 2) |
| ནི་ | ni | FokPart | -- (Topikalisierung) | FokPart |
| ཆོས་རེ་ | chos re | NZ | Chos re | iO:Dat (Kopf) |
| ལ་ | la | KSuf | -- | Dativmarkierung |
| གདམས་པ་ | gdams pa | Subst. | muendliche Unterweisung | dO:Abs (Kopf) |
| རྣམས་ | rnams | PlSuf | -- | Pluralsuffix |
| གསན་ | gsan | resp.; tdV; 1.,2.,3.SF | hoeren; studieren | P1:VG1;2.SF |
| ཞིང་ | zhing | Konj | und (koordinierend) | Konj |
| གཟིམས་གཡོག་ | gzims g.yog | Subst. | Hausgehilfe; Kammerdiener | dO:Abs |
| ཡུན་རིང་དུ་ | yun ring du | Adv | fuer lange Zeit | ABtemp:PP |
| མཛད་ | mdzad | resp.; tdV; 1.,2.,3.SF | machen; ausueben | P2:VG1;2.SF |
Stammformen: gsan pa -- gsan pa -- gsan pa -- gson (tdV) [Quelle: Lekt_18 WL; Lekt_15 UEB]
Stammformen: mdzad pa -- mdzad pa -- mdzad pa -- mdzod (tdV) [Quelle: Lekt_11 WL, Nr. 9]
G: dpal chen chos yes 0 ni \<S:Erg;FokPart\> / { \<TS1:\> chos re la \<iO:Dat\> gdams pa rnams 0 \<dO:Abs\> gsan zhing \<P1:VG1;2.SF;Konj\> } { \<TS2:\> gzims g.yog 0 \<dO:Abs\> yun ring du \<ABtemp:PP\> mdzad \<P2:VG1;2.SF\> / }
Ue: dPal chen Chos ye[s] studierte bei Chos re die [muendlichen] Unterweisungen und diente [ihm] fuer lange Zeit als Kammerdiener.
Anmerkungen:
- Zusammengesetzter Satz mit der koordinierenden Konjunktion -zhing (Allomorph von -cing nach dem Suffixbuchstaben -n: gsan endet auf -n, daher -zhing). Die Konjunktion verbindet zwei nebengeordnete Teilsaetze mit demselben Subjekt. [Quelle: Lekt_30 HO, S. 1--3]
- dpal chen (NZ) ist in Lekt_30 WL, Nr. 21 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 21]
- chos yes (PN) ist eine Kurzform fuer Chos kyi ye shes; die WL Nr. 22 fuehrt die Form als chos ye (ohne -s) auf. Bestaetigt: Die UEB-PDF zeigt ཆྟོས་ཡེས (chos yes) mit Schluss-s; dies ist eine in der UEB belegte erweiterte Kurzform (mit Anlautendung des nachfolgenden ye shes). Die WL-Form chos ye ist die rein abgekuerzte Variante. Beide Formen verweisen auf denselben Eigennamen Chos kyi ye shes. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 22; Lekt_30 UEB]
- ni als Fokuspartikel topikalisiert das Subjekt dpal chen chos yes: "Was dPal chen Chos ye[s] betrifft, ..."
- chos re (NZ): Die UEB-PDF zeigt ཆྟོས་རེ; dies ist hoechstwahrscheinlich ein OCR-/Transkriptionsfehler fuer chos rje (ཆོས་རྗེ "Dharma-Herr", gaengiger NZ/Ehrentitel). Die Lesung chos rje ist inhaltlich naheliegend (vgl. HO-Beispiel Lekt_30: chos rje de bzhin gshegs pa). [Quelle: Lekt_30 HO, S. 2] [Offene Frage: siehe grammatik/offene_fragen_verben.md, Eintrag 23 (chos re vs. chos rje als Lemma)]
- chos re/rje la: Die PP la markiert hier die Person, bei der man studiert (Dativ: "bei Chos rje").
- gdams pa ("muendliche Unterweisung") ist in Lekt_10 WL, Nr. 24 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_10 WL, Nr. 24]
- rnams (PlSuf) markiert die Plural: "die Unterweisungen".
- gsan (resp. fuer nyan pa, tdV; VG1): "hoeren; studieren". Das Subjekt (dpal chen chos yes) steht implizit im Ergativ (durch ni topikalisiert, kein explizites Kasussuffix). [Quelle: Lekt_18 WL]
- -zhing ist das Allomorph von -cing nach den Suffixbuchstaben -n, -m, -ng, -r, -l (hier: gsan endet auf -n). [Quelle: Lekt_30 HO, S. 1]
- gzims g.yog ("Hausgehilfe; Kammerdiener") ist in Lekt_11 WL, Nr. 38 als gzims g.yog pa eingefuehrt. [Quelle: Lekt_11 WL, Nr. 38]. Die Wendung gzims g.yog mdzad bedeutet "als Kammerdiener dienen" (woertlich: "den Kammerdiener machen").
- yun ring du ("fuer lange Zeit") ist eine stehende Wendung: yun ("Zeit", Lekt_21 WL, Nr. 17) + ring [po] ("lang", Lekt_21 WL, Nr. 18) + du (PP). Vgl. Lekt_21 UEB: yun ring du bzhugs ("verweilte fuer lange Zeit"). [Quelle: Lekt_21 WL, Nr. 17--18; Lekt_21 UEB]
- Textquelle: Deb ther sngon po (Blaue Annalen) von 'Gos lo tsa ba gZhon nu dpal, Buch 8, Kap. 4 (sGam po pa und seine Schueler). Engl. Uebers.: Roerich, *The Blue Annals*. [Externe Quelle: WisdomLib, Roerich Blue Annals]
- Kontext: dPal chen Chos ye[s] studierte bei Chos re die muendlichen Unterweisungen und diente ihm fuer lange Zeit als Kammerdiener.
[Quelle: Lekt_30 UEB, Satz 9]
Satz 10
Tibetisch: ལས་དྲག་པོ་དེའི་རྐྱེན་གིས་དགེ་སློང་དྲུག་ཅུ་པོ་དམྱལ་བར་ལྷུང་ཞིང་ཡུན་རིང་པོ་གནས།
Wylie: las drag po de'i rkyen gis dge slong drug cu po dmyal bar lhung zhing yun ring po gnas /
Morphemanalyse:
| Tibetisch | Wylie | Wortart | Bedeutung | Grammatische Funktion |
| ----------- | ------- | --------- | ----------- | ---------------------- |
| ལས་ | las | Subst. | Tat; Karma | ABkaus (Kopf, Teil 1) |
| དྲག་པོ་ | drag po | Adj | stark; heftig; hier: schlecht | Attribut (zu las) |
| དེ་ | de | DemPron | jene(r/s) | Attribut (zu las drag po) |
| འི་ | 'i | AttrSuf | -- | Genitivmarkierung |
| རྐྱེན་གིས་ | rkyen gis | PP | aufgrund | ABkaus:PP |
| དགེ་སློང་ | dge slong | Subst. | Moench; Skt. bhiksu | S:Abs (Kopf) |
| དྲུག་ཅུ་ | drug cu | ZW | sechzig | Zahlbestimmung (zu dge slong) |
| པོ་ | po | Suf | -- | Kollektivsuffix |
| དམྱལ་བ་ | dmyal ba | Subst. | Hoelle | ABlok (Kopf) |
| ར་ | -r | PP | in | ABlok:PP |
| ལྷུང་ | lhung | tmdV; 2.SF | (hinab)fallen | P1:VG6;2.SF |
| ཞིང་ | zhing | Konj | und (koordinierend) | Konj |
| ཡུན་རིང་པོ་ | yun ring po | Adv | fuer lange Zeit | ABtemp |
| གནས་ | gnas | tmdV; 1.,2.,3.SF | wohnen; verweilen | P2:VG3;2.SF |
Stammformen: lhung ba -- lhungs pa -- lhung ba (tmdV) [Quelle: Lekt_18 HO, S. 3; Lekt_30 WL, Nr. 26]
Stammformen: gnas pa -- gnas pa -- gnas pa (tmdV) [Quelle: Lekt_14 WL, Nr. 20]
G: las drag po de'i rkyen gis \<ABkaus:PP\> dge slong drug cu po 0 \<S:Abs\> { \<TS1:\> dmyal bar \<ABlok:PP\> lhung zhing \<P1:VG6;2.SF;Konj\> } { \<TS2:\> yun ring po \<ABtemp\> gnas \<P2:VG3;2.SF\> / }
Ue: Aufgrund jener schwerwiegenden Taten fielen die sechzig Moenche in die Hoelle hinab und verweilten [dort] fuer lange Zeit.
Anmerkungen:
- Zusammengesetzter Satz mit der koordinierenden Konjunktion -zhing (Allomorph von -cing nach dem Suffixbuchstaben -ng: lhung endet auf -ng, daher -zhing). Die Konjunktion verbindet zwei Teilsaetze mit demselben Subjekt. [Quelle: Lekt_30 HO, S. 1--3]
- Dieser Satz ist nahezu identisch mit dem HO-Beispiel in Lekt_18 HO, S. 3: las drag po de'i rkyen gyis dge slong drug cu po dmyal bar lhung [...]. Der Unterschied besteht darin, dass hier -zhing und ein zweiter Teilsatz (yun ring po gnas) angefuegt sind. [Quelle: Lekt_18 HO, S. 3]
- las drag po ("schwerwiegende Taten; kraeftiges Karma"): las ("Tat; Karma") mit dem Adjektiv drag po ("stark; heftig; hier: schlecht/schwerwiegend"). drag po ist in Lekt_30 WL, Nr. 23 mit der Bedeutung "stark; heftig; hier: schlecht" eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 23; Lekt_29 WL, Nr. 4]
- de'i rkyen gis ("aufgrund jener [Taten]"): rkyen gis ist eine zusammengesetzte Postposition ("aufgrund"), eingefuehrt in Lekt_30 WL, Nr. 24 als kyi rkyen gyis. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 24; Lekt_18 HO, S. 3]
- dge slong ("Moench; Skt. bhiksu") ist in Lekt_16 WL, Nr. 8 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_16 WL, Nr. 8]
- drug cu ("sechzig") ist in Lekt_21 WL, Nr. 29 eingefuehrt. po ist ein Kollektivsuffix: drug cu po = "die [Gruppe der] sechzig". [Quelle: Lekt_21 WL, Nr. 29]
- dmyal ba ("Hoelle") ist in Lekt_30 WL, Nr. 25 eingefuehrt. dmyal bar: Die PP -r markiert die Richtung ("in die Hoelle"). [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 25]
- lhung (2.SF von lhung ba, tmdV; VG6): "(hinab)fallen". lhung ba ist in Lekt_30 WL, Nr. 26 als 2.SF eingefuehrt; im vorliegenden Vergangenheitskontext steht es als 2.SF. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 26; Lekt_18 HO, S. 3]
- yun ring po ("fuer lange Zeit"): yun ("Zeit") + ring po ("lang"). Vgl. Lekt_21 UEB: yun ring du. Hier ohne PP du, aber die Bedeutung ist dieselbe. [Quelle: Lekt_21 WL, Nr. 17--18]
- gnas (tmdV; VG3): "wohnen; verweilen; sich aufhalten". Alle drei Stammformen sind identisch (gnas pa -- gnas pa -- gnas pa). Hier in der 2.SF (Vergangenheit). Das implizite Lokativ ("dort" = in der Hoelle) wird aus dem Kontext des ersten Teilsatzes erschlossen. [Quelle: Lekt_14 WL, Nr. 20]
- Textquelle: Deb ther sngon po (Blaue Annalen) von 'Gos lo tsa ba gZhon nu dpal, Buch 7, Kap. 6 (Tantrische Ueberlieferungen). Engl. Uebers.: Roerich, *The Blue Annals*. [Externe Quelle: WisdomLib, Roerich Blue Annals]
- Kontext: Aufgrund schwerwiegender Taten fielen sechzig Moenche in die Hoelle hinab und verweilten dort fuer lange Zeit. Der Satz illustriert die karmischen Konsequenzen verwerflicher Handlungen.
[Quelle: Lekt_30 UEB, Satz 10]
Satz 11
Tibetisch: དེ་ནས་བོད་དུ་ཕེབས་ཏེ་ཡུལ་ས་བཟུང་།
Wylie: de nas bod du phebs te yul sa bzung /
Morphemanalyse:
| Tibetisch | Wylie | Wortart | Bedeutung | Grammatische Funktion |
| ----------- | ------- | --------- | ----------- | ---------------------- |
| དེ་ནས་ | de nas | Adv | danach | ABtemp |
| བོད་ | bod | ON | Tibet | ABlok (Teil) |
| དུ་ | du | PP | nach | ABlok:PP |
| ཕེབས་ | phebs | tmdV (resp.); 1.,2.,3.,4.SF | gehen; kommen (resp.) | P1:VG3;2.SF |
| ཏེ་ | te | Konj | und | Konjunktion (koordinierend) |
| ཡུལ་ས་ | yul sa | Subst. | Ort; Land | dO:Abs |
| བཟུང་ | bzung | tdV; 2.SF | ergreifen; in Besitz nehmen | P2:VG1;2.SF |
Stammformen: phebs pa -- phebs pa -- phebs pa -- phebs (tmdV; resp.) [Quelle: Lekt_14 WL, Nr. 11]
Stammformen: 'dzin pa -- bzung ba -- gzung ba -- zung (tdV) [Quelle: Lekt_15 WL, Nr. 34; Lekt_17 UEB]
G: { \<TS1temp:\> de nas \<ABtemp\> bod du \<ABlok:PP\> phebs te \<P1:VG3;2.SF;Konj\> } { \<TS2:\> yul sa 0 \<dO:Abs\> bzung \<P2:VG1;2.SF\> / }
Ue: Danach reiste [er] nach Tibet und nahm [einen] Ort in Besitz.
Anmerkungen:
- Zwei Teilsaetze werden durch die Konjunktion -te koordiniert. Das Verhaeltnis ist temporal-sequentiell: erst die Reise, dann die Inbesitznahme. Die Konjunktion -te steht direkt hinter dem Verbstamm phebs (nicht hinter einem Verbalnomen), wie in Lekt_30 HO beschrieben. [Quelle: Lekt_30 HO, S. 1--4]
- phebs (tmdV; resp.; VG3) ist die respektvolle Form von 'gro ba ("gehen"). Alle vier Stammformen sind identisch (phebs pa). Die SF-Bestimmung (2.SF) ergibt sich aus dem narrativen Kontext (Vergangenheitsbericht). [Quelle: Lekt_14 WL, Nr. 11]
- yul sa ("Ort; Land") ist in Lekt_30 WL, Nr. 27 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 27]
- bzung ist die 2.SF von 'dzin pa ("ergreifen; in Besitz nehmen"; tdV). Hier in der Bedeutung "in Besitz nehmen; sich niederlassen". Das Subjekt (Agens) ist in beiden Teilsaetzen implizit und identisch. [Quelle: Lekt_15 WL, Nr. 34]
- OCR-/Schreibvarianten: བྟོད --> བོད (bod) [Phantom-ta]. Die UEB-PDF schreibt གཟུང (gzung); dies ist 3.SF (Futur) bzw. eine Schreibvariante. Im Vergangenheitskontext ist hier eher die 2.SF བཟུང (bzung) gemeint -- vgl. Stammformenparadigma in Lekt_15 WL, Nr. 34. Die Schiller-Materialien verwenden in den UEB gelegentlich die Form gzung anstelle von bzung.
- Textquelle: Deb ther sngon po (Blaue Annalen) von 'Gos lo tsa ba gZhon nu dpal, Buch 8, Kap. 1 (Mar pa und seine Schueler). Engl. Uebers.: Roerich, *The Blue Annals*. [Externe Quelle: WisdomLib, Roerich Blue Annals]
- Kontext: Eine biographische Angabe: Die betreffende Person reiste nach Tibet und nahm einen Ort in Besitz (d.h. gruendete eine Niederlassung).
[Quelle: Lekt_30 UEB, Satz 11]
Satz 12
Tibetisch: དེ་ནས་བིར་ཝ་པའི་དྲུང་དུ་ཕྱིན་ཏེ་རྣལ་འབྱོར་མའི་དབང་བསྐུར་ཞུས་པས་དེ་ཉིད་དུ་ཞལ་གཟིགས།
Wylie: de nas bir wa pa'i drung du phyin te rnal 'byor ma'i dbang bskur zhus pas de nyid du zhal gzigs /
Morphemanalyse:
| Tibetisch | Wylie | Wortart | Bedeutung | Grammatische Funktion |
| ----------- | ------- | --------- | ----------- | ---------------------- |
| དེ་ནས་ | de nas | Adv | danach | ABtemp |
| བིར་ཝ་པ་ | bir wa pa | PN | Viruupa (Skt.) | Bezugsperson (Possessor) |
| འི་ | 'i | AttrSuf | -- | Genitivmarkierung |
| དྲུང་དུ་ | drung du | PP | bei | ABlok:PP |
| ཕྱིན་ | phyin | tmdV; 2.SF | gehen | P1:VG3;2.SF |
| ཏེ་ | te | Konj | und | Konjunktion (koordinierend/temporal) |
| རྣལ་འབྱོར་མ་ | rnal 'byor ma | Subst. | Yoginii (Skt.) | Attribut (Possessor) |
| འི་ | 'i | AttrSuf | -- | Genitivmarkierung |
| དབང་བསྐུར་ | dbang bskur | Subst. | Weiheuebertragung; Ermaechtigung | dO:Abs |
| ཞུས་ | zhus | tdV; 2.SF | erbitten (resp.) | P2:VG1;2.SF |
| པས་ | pas | Konj | da; weil; als | Konj (°s: kausal/temporal) |
| དེ་ | de | DemPron | jener; genau | ABtemp (Teil) |
| ཉིད་ | nyid | FokPart | gerade; genau | FokPart |
| དུ་ | du | PP | in; dabei | PP |
| ཞལ་ | zhal | Subst. | Gesicht; Antlitz (resp.) | dO:Abs |
| གཟིགས་ | gzigs | tdV (resp.); 1.,2.,3.,4.SF | sehen; erblicken (resp.) | P3:VG1;2.SF |
Stammformen: 'gro ba -- phyin pa / song ba -- 'gro ba -- song (tmdV) [Quelle: Lekt_07 WL; Lekt_20 HO]
Stammformen: zhu ba -- zhus pa -- zhu ba -- zhus (tdV) [Quelle: Lekt_11 WL, Nr. 20]
Stammformen: gzigs pa -- gzigs pa -- gzigs pa -- gzigs (tdV; resp.) [Quelle: Lekt_04 WL, Nr. 89]
G: { \<TS1temp:\> de nas \<ABtemp\> bir wa pa'i drung du \<ABlok:PP\> phyin te \<P1:VG3;2.SF;Konj\> } { \<TS2kaus:\> rnal 'byor ma'i dbang bskur 0 \<dO:Abs\> zhus pas \<P2:VG1;2.SF;Konj\> } { \<TS3:\> de nyid du \<ABtemp:PP\> zhal 0 \<dO:Abs\> gzigs \<P3:VG1;2.SF\> / }
Ue: Danach ging [er] zu Viruupa, und da [er] die Yoginii-Weiheuebertragung erbat, erblickte [er] genau dabei [das goettliche] Antlitz.
Anmerkungen:
- Der Satz enthaelt drei Teilsaetze: (1) phyin te (temporal, mit Konj -te: "ging ... und"), (2) zhus pas (kausal/temporal, mit Konj °s: "da [er] erbat"), (3) zhal gzigs (Hauptsatz: "erblickte das Antlitz").
- bir wa pa (Viruupa) ist in Lekt_30 WL, Nr. 28 als PN eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 28]
- kyi drung du ("bei") ist in Lekt_30 WL, Nr. 29 als PP eingefuehrt. Hier steht bir wa pa'i drung du ("bei Viruupa"). [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 29]
- rnal 'byor ma ("Yoginii"; Skt. yoginii) ist in Lekt_08 WL, Nr. 52 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_08 WL, Nr. 52]. rnal 'byor ma'i dbang bskur = "Yoginii-Weiheuebertragung" (Genitivkompositum).
- dbang bskur ("Weiheuebertragung; Ermaechtigung") ist in Lekt_22 WL, Nr. 9 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_22 WL, Nr. 9]
- zhus (2.SF von zhu ba) bedeutet "erbitten; bitten" (resp.). [Quelle: Lekt_11 WL, Nr. 20]. Das Subjekt (Agens) steht implizit im Ergativ.
- zhal gzigs: woertlich "das Antlitz erblicken" -- eine respektvolle Wendung fuer die direkte Vision einer Gottheit. zhal ("Gesicht; Antlitz", resp.) ist in Lekt_09 WL, Nr. 2 / Lekt_28 WL, Nr. 25 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_28 WL, Nr. 25]. gzigs (tdV; resp.; 1.,2.,3.,4.SF) ist die respektvolle Form von mthong ba ("sehen"). [Quelle: Lekt_04 WL, Nr. 89]
- de nyid du: "genau dabei; unmittelbar daraufhin". de (DemPron) + nyid (FokPart) + du (PP). Die Konstruktion betont die Unmittelbarkeit des Visionserlebnisses.
- OCR-Korrekturen: ཕིན --> ཕྱིན (phyin) [fehlende Subskript-ya]; འབྟོར --> འབྱོར ('byor) [Subskript-ta statt ya].
- bir wa pa (Viruupa): Einer der 84 indischen Mahasiddhas (ca. 8.-9. Jh.), indischer Gruender der Lamdre-Tradition der Sakya-Schule. [Externe Quelle: diverse Online-Enzyklopaedien]
- Textquelle: Deb ther sngon po (Blaue Annalen) von 'Gos lo tsa ba gZhon nu dpal, Buch 4, Kap. 1 (Die Lam 'bras-Ueberlieferung) / Buch 7 (Tantrische Ueberlieferungen). Engl. Uebers.: Roerich, *The Blue Annals*. [Externe Quelle: WisdomLib, Roerich Blue Annals]
- Kontext: Viruupa (bir wa pa) erteilte die Yoginii-Weiheuebertragung. Als der Schueler diese erbat, hatte er unmittelbar eine Vision des goettlichen Antlitzes.
[Quelle: Lekt_30 UEB, Satz 12]
Satz 13
Tibetisch: དེ་ནས་ལོ་བཅུ་དྲུག་པ་ཆུ་མོ་སྦྲུལ་ལ་ལྷ་དང་མཁའ་འགྲོ་ཆོས་སྐྱོང་གཞི་བདག་རྣམས་ཀྱིས་སྤྱན་དྲངས་ཏེ་གདན་སེང་གེའི་ཁྲི་ལ་བཞུགས་སོ།
Wylie: de nas lo bcu drug pa chu mo sbrul la lha dang mkha' 'gro chos skyong gzhi bdag rnams kyis spyan drangs te gdan seng ge'i khri la bzhugs so /
Morphemanalyse:
| Tibetisch | Wylie | Wortart | Bedeutung | Grammatische Funktion |
| ----------- | ------- | --------- | ----------- | ---------------------- |
| དེ་ནས་ | de nas | Adv | danach | ABtemp |
| ལོ་ | lo | Subst. | Jahr | ABtemp (Teil) |
| བཅུ་དྲུག་པ་ | bcu drug pa | ZW + OrdSuf | sechzehnt- | Attribut (zu lo) |
| ཆུ་མོ་སྦྲུལ་ | chu mo sbrul | Subst. | weibliches Wasser-Schlangen-[Jahr] | Apposition (zu lo bcu drug pa) |
| ལ་ | la | PP | in; im | ABtemp:PP |
| ལྷ་ | lha | Subst. | Gottheit | S:Erg (Teil) |
| དང་ | dang | Konj | und | Konjunktion (Aufzaehlung) |
| མཁའ་འགྲོ་ | mkha' 'gro | Subst. | Daakiniis (Skt. dakinii) | S:Erg (Teil) |
| ཆོས་སྐྱོང་ | chos skyong | Subst. | Schutzgottheit | S:Erg (Teil) |
| གཞི་བདག་ | gzhi bdag | Subst. | Ortsgottheit | S:Erg (Teil) |
| རྣམས་ | rnams | PlSuf | -- | Pluralmarkierung |
| ཀྱིས་ | kyis | KSuf | -- | Ergativmarkierung |
| སྤྱན་དྲངས་ | spyan drangs | tdV; 2.SF | einladen; herbeibringen (resp.) | P1:VG1;2.SF |
| ཏེ་ | te | Konj | und | Konjunktion (temporal/konsekutiv) |
| གདན་ | gdan | Subst. | Kloster | ABlok (Teil) |
| སེང་གེ་ | seng ge | Subst. | Loewe | Attribut (zu khri) |
| འི་ | 'i | AttrSuf | -- | Genitivmarkierung |
| ཁྲི་ | khri | Subst. | Thron | ABlok (Teil) |
| ལ་ | la | PP | auf | ABlok:PP |
| བཞུགས་ | bzhugs | tmdV (resp.); 1.,2.,3.,4.SF | sich niederlassen; residieren (resp.) | P2:VG3;2.SF |
| སོ་ | so | FinSuf | -- | Finalsuffix |
Stammformen: spyan 'dren pa -- spyan drangs -- spyan 'dren pa -- spyan drangs (tdV; resp.) [Quelle: Lekt_27 WL, Nr. 40; Lekt_28 WL, Nr. 19]
Stammformen: bzhugs pa -- bzhugs pa -- bzhugs pa -- bzhugs (tmdV; resp.) [Quelle: Lekt_04 WL, Nr. 91; Lekt_14 WL]
G: { \<TS1temp:\> de nas \<ABtemp\> lo bcu drug pa chu mo sbrul la \<ABtemp:PP\> lha dang mkha' 'gro chos skyong gzhi bdag rnams kyis \<S:Erg\> spyan drangs te \<P1:VG1;2.SF;Konj\> } { \<TS2:\> gdan seng ge'i khri la \<ABlok:PP\> bzhugs \<P2:VG3;2.SF\> so / }
Ue: Danach, im sechzehnten [Lebens]jahr, dem weiblichen Wasser-Schlangen-[Jahr], wurde [er] von Gottheiten, Daakiniis, Schutzgottheiten [und] Ortsgottheiten eingeladen, und [er] nahm auf dem Loewenthron des Klosters Platz.
Anmerkungen:
- Zwei Teilsaetze werden durch die Konjunktion -te koordiniert (temporal-sequentiell): erst die Einladung, dann die Inthronisierung. [Quelle: Lekt_30 HO, S. 1--4]
- lo bcu drug pa chu mo sbrul la: "im sechzehnten [Lebens]jahr, dem weiblichen Wasser-Schlangen-[Jahr]". Die Ordinalzahl bcu drug pa ("sechzehnt-") ist durch -pa gebildet. chu mo sbrul ist eine Zeitangabe im 60-Jahres-Zyklus (Nr. 27 im Zyklus: chu mo sbrul). [Quelle: Lekt_10 HO, S. 2]
- lha dang mkha' 'gro chos skyong gzhi bdag rnams kyis: Aufzaehlung von vier Klassen uebernatuerlicher Wesen als Subjekt im Ergativ. lha ("Gottheit") ist in Lekt_04 WL eingefuehrt [Quelle: Lekt_04 WL]. mkha' 'gro ("Daakiniis") ist die verkuerzte Form von mkha' 'gro ma, eingefuehrt in Lekt_14 WL, Nr. 6. [Quelle: Lekt_14 WL, Nr. 6]. chos skyong ("Schutzgottheit") ist in Lekt_30 WL, Nr. 30 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 30]. gzhi bdag ("Ortsgottheit") ist in Lekt_30 WL, Nr. 31 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 31]. Beachte: dang steht nur nach lha und verbindet die ersten beiden Glieder; die folgenden (chos skyong, gzhi bdag) werden asyndetisch (ohne Konjunktion) angereiht.
- spyan drangs (2.SF von spyan 'dren pa) = "einladen; herbeibringen (resp.)", eingefuehrt in Lekt_27 WL, Nr. 40. [Quelle: Lekt_27 WL, Nr. 40]. Das implizite Objekt der Einladung (die zu respektierende Person) ist das implizite Subjekt von bzhugs im folgenden Teilsatz. Die Konstruktion ist passivisch zu verstehen: "[er] wurde eingeladen von ...".
- gdan seng ge'i khri: "Loewenthron des Klosters". gdan ([sa] "Kloster") ist in Lekt_30 WL, Nr. 32 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 32]. seng ge ("Loewe") ist in Lekt_30 WL, Nr. 33 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 33]. Die Genitivkette gdan seng ge'i khri kann als "Loewenthron des Klosters" oder -- da gdan auch "Sitz" bedeutet -- als "Sitz, [naemlich] der Loewenthron" verstanden werden. Der Loewenthron (Skt. simhaasana) ist der traditionelle Lehrsitz hochgestellter Meister.
- OCR-Korrekturen: ལྟོ --> ལོ (lo) [Phantom-ta]; མྟོ --> མོ (mo) [Phantom-ta]; འགྲྟོ --> འགྲོ ('gro) [Phantom-ta]; ཆྟོས --> ཆོས (chos) [Phantom-ta]; སྟོང --> སྐྱོང (skyong) [bestaetigt durch Lekt_30 WL, Nr. 30: chos skyong "Schutzgottheit"; OCR hat Subskript-ya verloren und ein Phantom-ta eingesetzt]; ཀིས --> ཀྱིས (kyis) [fehlende Subskript-ya]; ཁི --> ཁྲི (khri) [fehlende Subskript-ra]; སྟོ --> སོ (so) [Phantom-ta].
- Textquelle: Deb ther sngon po (Blaue Annalen) von 'Gos lo tsa ba gZhon nu dpal, Buch 8, Kap. 11 (Die 'Bri gung pa). Engl. Uebers.: Roerich, *The Blue Annals*. [Externe Quelle: WisdomLib, Roerich Blue Annals]
- Kontext: Im sechzehnten Lebensjahr, dem weiblichen Wasser-Schlangen-Jahr, wurde die betreffende Person von Gottheiten, Daakiniis und Schutzgottheiten eingeladen und nahm auf dem Loewenthron des Klosters Platz.
[Quelle: Lekt_30 UEB, Satz 13]
Satz 14
Tibetisch: པཎ་ཆེན་གི་ཕྱགས་ཕྱིར་ལོ་གཅིག་བཞུགས་ཏེ་ཆོས་ཞུས།
Wylie: paN chen gi phyags phyir lo gcig bzhugs te chos zhus /
Morphemanalyse:
| Tibetisch | Wylie | Wortart | Bedeutung | Grammatische Funktion |
| ----------- | ------- | --------- | ----------- | ---------------------- |
| པཎ་ཆེན་ | paN chen | NZ | Pan chen | Possessor |
| གི་ | gi | AttrSuf | -- | Genitivmarkierung |
| ཕྱགས་ཕྱི་ | phyags phyi | Subst. | Diener | ABmod (Kopf) |
| ར་ | -r | PP | als | ABmod:PP |
| ལོ་ | lo | Subst. | Jahr | ABtemp (Teil) |
| གཅིག་ | gcig | ZW | eins | Attribut (zu lo) |
| བཞུགས་ | bzhugs | tmdV (resp.); 1.,2.,3.,4.SF | verweilen; sich aufhalten (resp.) | P1:VG3;2.SF |
| ཏེ་ | te | Konj | und | Konjunktion (koordinierend/temporal) |
| ཆོས་ | chos | Subst. | Lehre | dO:Abs |
| ཞུས་ | zhus | tdV; 2.SF | erbitten (resp.) | P2:VG1;2.SF |
Stammformen: bzhugs pa -- bzhugs pa -- bzhugs pa -- bzhugs (tmdV; resp.) [Quelle: Lekt_04 WL, Nr. 91; Lekt_14 WL]
Stammformen: zhu ba -- zhus pa -- zhu ba -- zhus (tdV) [Quelle: Lekt_11 WL, Nr. 20]
G: { \<TS1temp:\> paN chen gi phyags phyir \<ABmod:PP\> lo gcig \<ABtemp\> bzhugs te \<P1:VG3;2.SF;Konj\> } { \<TS2:\> chos 0 \<dO:Abs\> zhus \<P2:VG1;2.SF\> / }
Ue: [Er] verweilte ein Jahr als Diener des Pan chen und erbat [die] Lehre.
Anmerkungen:
- Zwei Teilsaetze werden durch die Konjunktion -te koordiniert (temporal-sequentiell). [Quelle: Lekt_30 HO, S. 1--4]
- paN chen ("Pan chen") ist ein Namenszusatz, abgekuerzt von paN+Di ta chen po ("grosser Gelehrter"). Vgl. Lekt_29 WL, Nr. 19 (pan). [Quelle: Lekt_29 WL, Nr. 19]
- paN chen gi: Genitivkonstruktion ("des Pan chen") -- der Genitiv -gi knuepft das Possessor-NZ an phyags phyi an. Pan chen ist hier nicht Subjekt, sondern Bezugsperson; das Subjekt der Handlung ist implizit (die zuvor besprochene Person, die als Diener des Pan chen wirkt).
- phyags phyi ("Diener") ist in Lekt_30 WL, Nr. 34 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 34]. phyags phyir (mit PP -r) = "als Diener". Die PP -r markiert hier die Funktion/Rolle ("in der Eigenschaft als"). Die Konstruktion paN chen gi phyags phyir bedeutet woertlich: "als Diener des Pan chen".
- lo gcig ("ein Jahr") ist eine temporale Adverbialbestimmung. lo ("Jahr") ist ein haeufig verwendetes Zeitnomen. gcig ("eins") ist in Lekt_02 WL eingefuehrt. [Quelle: Lekt_02 WL]
- bzhugs (resp.; tmdV; VG3) = "sich aufhalten; verweilen". Subjekt implizit. [Quelle: Lekt_14 WL]
- chos zhus: "die Lehre erbeten". zhus (2.SF von zhu ba, tdV) = "erbitten" (resp.). [Quelle: Lekt_11 WL, Nr. 20]. chos ("Lehre") steht als direktes Objekt im Absolutiv.
- OCR-/Phantom-ta-Varianten in der UEB-PDF: ལྟོ --> ལོ (lo); ཆྟོས --> ཆོས (chos). Die Schreibung ཕྱགས (phyags) entspricht der WL Nr. 34 und ist korrekt (nicht phyag).
- Textquelle: Deb ther sngon po (Blaue Annalen) von 'Gos lo tsa ba gZhon nu dpal, Buch 8, Kap. 1 (Mar pa und seine Schueler). Engl. Uebers.: Roerich, *The Blue Annals*. [Externe Quelle: WisdomLib, Roerich Blue Annals]
- Kontext: Pan chen verweilte ein Jahr lang als Diener bei einem Meister und erbat die Lehre.
[Quelle: Lekt_30 UEB, Satz 14]
Satz 15
Tibetisch: དེར་གྲུབ་ཆེན་པའི་དྲུང་དུ་ཕྱིན་པ་ན་སྟན་དེ་ལ་ཐོགས་པ་མེད་པར་འཛེགས་ཏེ་བཞུགས།
Wylie: der grub chen pa'i drung du phyin pa na stan de la thogs pa med par 'dzegs te bzhugs /
Morphemanalyse:
| Tibetisch | Wylie | Wortart | Bedeutung | Grammatische Funktion |
| ----------- | ------- | --------- | ----------- | ---------------------- |
| དེར་ | der | Adv | dort; dorthin | ABlok |
| གྲུབ་ཆེན་པ་ | grub chen pa | NZ | Grub chen pa; Skt. Mahaasiddha | Bezugsperson (Possessor) |
| འི་ | 'i | AttrSuf | -- | Genitivmarkierung |
| དྲུང་དུ་ | drung du | PP | bei | ABlok:PP |
| ཕྱིན་པ་ | phyin pa | tmdV; 2.SF + NomSuf | gehen | P1:VG3;2.SF |
| ན་ | na | Konj | als | Konj (temporal) |
| སྟན་ | stan | Subst. | Sitzmatte | ABlok (Teil) |
| དེ་ | de | DemPron | jener; dieser | Attribut (zu stan) |
| ལ་ | la | PP | auf | ABlok:PP |
| ཐོགས་པ་མེད་པར་ | thogs pa med par | Adv | unbehindert | ABmod |
| འཛེགས་ | 'dzegs | tdV; 2.SF | hinaufsteigen | P2:VG1;2.SF |
| ཏེ་ | te | Konj | und | Konjunktion (koordinierend/temporal) |
| བཞུགས་ | bzhugs | tmdV (resp.); 1.,2.,3.,4.SF | sich niederlassen; Platz nehmen (resp.) | P3:VG3;2.SF |
Stammformen: 'gro ba -- phyin pa / song ba -- 'gro ba -- song (tmdV) [Quelle: Lekt_07 WL; Lekt_20 HO]
Stammformen: 'dzeg pa -- 'dzegs pa -- 'dzeg pa -- 'dzegs (tdV; VG3) [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 37; grammatik/verben.md, Zeile 111] [Externe Quelle: Hill 2010; Rangjung Yeshe Wiki]
Stammformen: bzhugs pa -- bzhugs pa -- bzhugs pa -- bzhugs (tmdV; resp.) [Quelle: Lekt_04 WL, Nr. 91; Lekt_14 WL]
G: { \<TS1temp:\> der \<ABlok\> grub chen pa'i drung du \<ABlok:PP\> phyin pa na \<P1:VG3;2.SF;Konj\> } { \<TS2temp:\> stan de la \<ABlok:PP\> thogs pa med par \<ABmod\> 'dzegs te \<P2:VG1;2.SF;Konj\> } { \<TS3:\> bzhugs \<P3:VG3;2.SF\> / }
Ue: Als [er] dort zum Mahaasiddha ging, stieg [er] unbehindert auf jene Sitzmatte hinauf und nahm Platz.
Anmerkungen:
- Der Satz enthaelt drei Teilsaetze: (1) phyin pa na (temporal, mit Konj -na hinter Verbalnomen: "als [er] ging"), (2) 'dzegs te (temporal-sequentiell, mit Konj -te: "stieg hinauf und"), (3) bzhugs (Hauptsatz: "nahm Platz").
- Beachte den Unterschied: In Teilsatz 1 steht die Konjunktion -na hinter dem Verbalnomen phyin pa (Verbstamm + NomSuf -pa), waehrend in Teilsatz 2 die Konjunktion -te direkt hinter dem Verbstamm 'dzegs steht. -na hinter Verbalnomen gehoert zu den Konjunktionen aus Lekt_29 (vgl. Lekt_29 HO, S. 4); -te hinter Verbstamm gehoert zu den neuen Konjunktionen aus Lekt_30 (vgl. Lekt_30 HO, S. 1--4).
- grub chen pa ("Mahaasiddha"; NZ) ist ein buddhistischer Titel ("der grosse Verwirklichte"; Skt. mahaasiddha). Vgl. Lekt_28 HO: grub chen als NZ. [Quelle: Lekt_28 HO, S. 2]
- kyi drung du ("bei") ist in Lekt_30 WL, Nr. 29 als PP eingefuehrt. Hier: grub chen pa'i drung du ("beim Mahaasiddha"). [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 29]
- stan ("Sitzmatte") ist in Lekt_30 WL, Nr. 35 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 35]. stan de la = "auf jener Sitzmatte".
- thogs pa med par ("unbehindert") ist in Lekt_30 WL, Nr. 36 als Adverb eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 36]. Woertlich: "ohne Behinderung" (thogs pa = Behinderung; med pa = nicht vorhanden; -r = PP). Dies deutet auf ein uebernatuerliches Geschehen hin: Der Praktizierende konnte sich muhelos auf den Sitz setzen.
- 'dzegs pa ("hinaufsteigen"; tdV; 2.SF) ist in Lekt_30 WL, Nr. 37 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 37]. Die vollstaendigen Stammformen sind: 'dzeg pa -- 'dzegs pa -- 'dzeg pa -- 'dzegs (tdV; VG3). [Quelle: grammatik/verben.md, Zeile 111 (Lekt_30 [erg.])] [Externe Quelle: Hill 2010; Rangjung Yeshe Wiki]
- bzhugs (tmdV; resp.; VG3) = "sich niederlassen; Platz nehmen; residieren". [Quelle: Lekt_14 WL]
- OCR-Korrekturen: ཕིན --> ཕྱིན (phyin) [fehlende Subskript-ya]; སན --> སྟན (stan) [fehlende Subskript-ta]; ཐྟོགས --> ཐོགས (thogs) [Phantom-ta].
- Textquelle: Deb ther sngon po (Blaue Annalen) von 'Gos lo tsa ba gZhon nu dpal, Buch 8, Kap. 1 (Mar pa und seine Schueler). Engl. Uebers.: Roerich, *The Blue Annals*. [Externe Quelle: WisdomLib, Roerich Blue Annals]
- Kontext: Die betreffende Person ging zu einem Mahaasiddha und stieg unbehindert auf dessen Sitzmatte hinauf -- ein Zeichen uebernatuerlicher Faehigkeiten.
[Quelle: Lekt_30 UEB, Satz 15]
Satz 16
Tibetisch: དགུ་བཅུ་རྩ་བདུན་པ་ས་མོ་ལུག་གི་ལོ་ལ་ངོ་མཚར་བའི་ལྟས་དང་བཅས་ཏེ་གཤེགས།
Wylie: dgu bcu rtsa bdun pa sa mo lug gi lo la ngo mtshar ba'i ltas dang bcas te gshegs /
Morphemanalyse:
| Tibetisch | Wylie | Wortart | Bedeutung | Grammatische Funktion |
| ----------- | ------- | --------- | ----------- | ---------------------- |
| དགུ་བཅུ་རྩ་བདུན་པ་ | dgu bcu rtsa bdun pa | ZW | der siebenundneunzigste | ABtemp (Teil) |
| ས་མོ་ | sa mo | Subst. | Erde-weiblich (Elementbezeichnung) | ABtemp (Teil) |
| ལུག་ | lug | Subst. | Schaf (Tierkreiszeichen) | ABtemp (Teil) |
| གི་ | gi | AttrSuf | -- | Genitivmarkierung |
| ལོ་ | lo | Subst. | Jahr | ABtemp (Teil) |
| ལ་ | la | PP | in; im | ABtemp |
| ངོ་མཚར་བ་ | ngo mtshar ba | Adj | wundervoll | Attribut (zu ltas) |
| འི་ | 'i | AttrSuf | -- | Genitivmarkierung |
| ལྟས་ | ltas | Subst. | Zeichen | ABmod (Teil) |
| དང་བཅས་ | dang bcas | PP | zusammen mit; begleitet von | ABmod |
| ཏེ་ | te | Konj | und; indem | Koordinierende Konjunktion |
| གཤེགས་ | gshegs | tmdV; 1.,2.,3.SF (resp.) | sterben (resp.) | P:VG6;2.SF |
Stammformen: gshegs pa -- gshegs pa -- gshegs pa -- gshegs (tmdV; resp.) [Quelle: Lekt_04 WL, Nr. 90; Lekt_14 HO]
G: dgu bcu rtsa bdun pa sa mo lug gi lo la \<ABtemp:PP\> ngo mtshar ba'i ltas dang bcas te \<ABmod:PP;Konj\> gshegs \<P:VG6;2.SF\> /
Ue: Im siebenundneunzigsten [Lebensjahr], dem Erde-Schaf-Jahr, starb [er] begleitet von wundervollen Zeichen.
Anmerkungen:
- dgu bcu rtsa bdun pa ("der siebenundneunzigste"): Ordinalzahl, gebildet durch Suffix -pa. dgu bcu rtsa bdun ("siebenundneunzig") ist in Lekt_30 WL, Nr. 38 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 38]
- sa mo lug gi lo: "Erde-Schaf-Jahr" -- eine Jahresbezeichnung im tibetischen Kalendersystem. sa mo = Erde-weiblich (Element); lug = Schaf (Tierkreiszeichen). Vgl. sa mo lug in Lekt_28 UEB, Satz 14. [Quelle: Lekt_03 WL (lug); Lekt_03 WL (sa)]
- ngo mtshar ba ("wundervoll") ist in Lekt_30 WL, Nr. 39 als Adj eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 39]
- ltas ("Zeichen") ist in Lekt_30 WL, Nr. 40 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 40]
- dang bcas ("zusammen mit; begleitet von") ist in Lekt_16 WL, Nr. 29 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_16 WL, Nr. 29]
- te: Koordinierende Konjunktion (Allomorph von -ste/-te/-de) hinter einem Verbstamm. Hier steht te hinter dang bcas, was die modale Begleitumstaende des Sterbens ausdrueckt: "begleitet von wundervollen Zeichen [und so] starb [er]". Die Konstruktion dang bcas te verbindet den modalen Ausdruck mit dem Hauptverb. [Quelle: Lekt_30 HO, S. 1--4]
- gshegs pa ("sterben", resp.) ist die respektvolle Form fuer "sterben; verscheiden" (VG6: intransitiv, nicht-kontrollierbar). Eingefuehrt in Lekt_04 WL, Nr. 90; als "sterben" belegt in Lekt_14 HO und Lekt_28 UEB. [Quelle: Lekt_04 WL, Nr. 90; Lekt_14 HO]
- Das Subjekt ist implizit (aus dem Kontext: die zuvor besprochene Person).
- Textquelle: Deb ther sngon po (Blaue Annalen) von 'Gos lo tsa ba gZhon nu dpal, Buch 8, Kap. 1 (Mar pa und seine Schueler). Engl. Uebers.: Roerich, *The Blue Annals*. [Externe Quelle: WisdomLib, Roerich Blue Annals]
- Kontext: Eine biographische Angabe zum Tod: Im siebenundneunzigsten Lebensjahr, dem Erde-Schaf-Jahr, starb die betreffende Person begleitet von wundervollen Zeichen.
[Quelle: Lekt_30 UEB, Satz 16]
Satz 17
Tibetisch: རས་པ་རྡོ་རྗེ་དཔལ་ལྷོ་བལ་དུ་གསེར་གདུགས་དང་གྷ་ཊི་ར་སྒྲུབ་ཏུ་བཏང་བས་གྲུབ་སྟེ་བྱུང་།
Wylie: ras pa rdo rje dpal lho bal du gser gdugs dang g+ha Ti ra sgrub tu btang bas grub ste byung /
Morphemanalyse:
| Tibetisch | Wylie | Wortart | Bedeutung | Grammatische Funktion |
| ----------- | ------- | --------- | ----------- | ---------------------- |
| རས་པ་ | ras pa | NZ | Ras pa | S:Erg (Teil) |
| རྡོ་རྗེ་དཔལ་ | rdo rje dpal | PN | rDo rje dpal | S:Erg (Teil) |
| ལྷོ་བལ་ | lho bal | ON | Indien und Nepal | ABlok (Teil) |
| དུ་ | du | PP | nach | ABlok |
| གསེར་གདུགས་ | gser gdugs | Subst. | Goldschirm | dO:Abs (Teil 1) |
| དང་ | dang | Konj | und | Konjunktion (Nominalkoordination) |
| གྷ་ཊི་ར་ | g+ha Ti ra | Subst. | Ganjira (Ornamentaufbau) | dO:Abs (Teil 2) |
| སྒྲུབ་ | sgrub | tdV; 1.SF | vollbringen; herstellen | P2 (Finalsatz) |
| ཏུ་ | tu | Konj | um zu | Gliedsatzkonjunktion (Finalsatz) |
| བཏང་ | btang | tdV; 2.SF | schicken; senden | P1:VG1;2.SF |
| བས་ | bas | Konj | als; weil | Gliedsatzkonjunktion (temporal/kausal) |
| གྲུབ་ | grub | tmdV; 2.SF | vollendet sein; gelingen | P3:VG6;2.SF |
| སྟེ་ | ste | Konj | und | Koordinierende Konjunktion |
| བྱུང་ | byung | tmdV; 2.SF | erscheinen; geschehen | P4:VG6;2.SF (HV) |
Stammformen (gtong ba): gtong ba -- btang ba -- gtang ba -- thong (tdV) [Quelle: Lekt_19 WL; Lekt_22 UEB]
Stammformen (sgrub pa): sgrub pa -- bsgrubs pa -- bsgrub pa -- sgrubs (tdV) [Quelle: Lekt_08 WL, Nr. 52]
Stammformen (grub pa): 'grub pa -- grub pa -- 'grub pa (tmdV) [Quelle: Lekt_08 WL, Nr. 2]
Stammformen (byung ba): 'byung ba -- byung ba -- 'byung ba (tmdV) [Quelle: Lekt_08 WL]
G: ras pa rdo rje dpal O \<dO:Abs\> lho bal du \<ABlok:PP\> { \<TSfin:\> gser gdugs dang g+ha Ti ra O \<dO:Abs\> sgrub tu \<P2:VG1;1.SF;Konj\> } btang bas \<P1:VG1;2.SF;Konj\> grub ste \<P3:VG6;2.SF;Konj\> byung \<P4:VG6;2.SF\> /
Ue: Da [man] Ras pa rDo rje dpal nach lHo bal schickte, um einen Goldschirm und [eine] Ganjira herzustellen, gelang [es] [und] kam zustande.
Anmerkungen:
- ras pa ("Ras pa") ist ein NZ, eingefuehrt in Lekt_30 WL, Nr. 41. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 41]
- rdo rje dpal ("rDo rje dpal") ist ein PN, eingefuehrt in Lekt_30 WL, Nr. 42. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 42]
- lho bal ("Indien und Nepal", wtl. "Sueden und Nepal", kurz fuer lho dang bal yul) ist in Lekt_30 WL, Nr. 43 eingefuehrt. Auch in Lekt_17 WL belegt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 43; Lekt_17 WL]
- gser gdugs ("Goldschirm") ist in Lekt_30 WL, Nr. 44 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 44]
- g+ha Ti ra ("Ganjira", ein turmaehnlicher Ornamentaufbau auf Sakralbauten, gewoehnlich: gan ji ra) ist in Lekt_30 WL, Nr. 45 eingefuehrt. Das '+' in g+ha zeigt die Sanskrit-Ligatur gha an. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 45]
- sgrub tu: Finalsatz. Die 1.SF sgrub + Gliedsatzkonjunktion -tu drueckt den Zweck der Entsendung aus: "um herzustellen". Vgl. das HO-Beispiel len du byon (Lekt_28 HO, S. 4). [Quelle: Lekt_28 HO, S. 4]
- btang (2.SF von gtong ba, tdV): "schicken; senden". Die Konstruktion sgrub tu btang = "schickte, um herzustellen". [Quelle: Lekt_19 WL]
- btang bas: Die Konjunktion -°s (Allomorph zu -kyis) nach dem Verbalnomen btang ba verbindet den ersten Teilsatz (kausal/temporal) mit dem zweiten. "Weil/als [er] geschickt wurde, gelang es." [Quelle: Lekt_29 HO, S. 2--3]
- grub ste: grub (2.SF von 'grub pa, tmdV, VG6) = "es gelang; es war vollendet". ste ist die koordinierende Konjunktion (Allomorph von -te nach -b). [Quelle: Lekt_08 WL, Nr. 2; Lekt_30 HO, S. 1--4]
- byung (2.SF von 'byung ba) fungiert hier als Hilfsverb (HV), das die Realisierung des Ereignisses markiert: grub ste byung = "es gelang [tatsaechlich]". [Quelle: Lekt_08 WL]
- Kasusmarkierung: ras pa rdo rje dpal steht ohne Ergativsuffix im Absolutiv. Da btang ein transitives Verb (gtong ba) ist, fungiert ras pa rdo rje dpal hier als direktes Objekt (dO:Abs): "[man] schickte Ras pa rDo rje dpal" bzw. passivisch: "Ras pa rDo rje dpal wurde geschickt". Das Agens (die schickende Person) ist implizit.
- Textquelle: Deb ther sngon po (Blaue Annalen) von 'Gos lo tsa ba gZhon nu dpal, Buch 8, Kap. 4 (sGam po pa und seine Schueler). Engl. Uebers.: Roerich, *The Blue Annals*. [Externe Quelle: WisdomLib, Roerich Blue Annals]
- Kontext: Ras pa rDo rje dpal wurde nach lHo bal (Indien/Nepal) geschickt, um einen Goldschirm und eine Ganjira (Ornamentaufbau) herzustellen, und das Vorhaben gelang.
[Quelle: Lekt_30 UEB, Satz 17]
Satz 18
Tibetisch: ཁོང་མཚན་ཉིད་ལ་མཁས་པས་ཆོས་རྗེའི་དྲུང་དུ་མཐོ་འཚམ་དུ་བྱོན་པས་ཞལ་མཐོང་བས་དད་དེ་གདམས་པ་ཞུས་པས་ཡོན་ཏན་གྱི་ཁྱད་པར་ཆེན་པོ་བརྙེས།
Wylie: khong mtshan nyid la mkhas pas chos rje'i drung du mtho 'tsham du byon pas zhal mthong bas dad de gdams pa zhus pas yon tan gyi khyad par chen po brnyes /
Morphemanalyse:
| Tibetisch | Wylie | Wortart | Bedeutung | Grammatische Funktion |
| ----------- | ------- | --------- | ----------- | ---------------------- |
| ཁོང་ | khong | PersPron (resp.) | er (resp.) | S:Abs |
| མཚན་ཉིད་ | mtshan nyid | Subst. | nichttantrischer Lehrkorpus | ABlok (Teil) |
| ལ་ | la | PP | in; in Bezug auf | ABlok |
| མཁས་པ་ | mkhas pa | tmdV; 1.,2.,3.SF | gelehrt sein | P1:VG5;2.SF |
| ས་ | -s | Konj | weil; als | Gliedsatzkonjunktion |
| ཆོས་རྗེ་ | chos rje | NZ | Chos rje (Ehrentitel) | ABlok (Teil) |
| འི་དྲུང་དུ་ | 'i drung du | PP | bei | ABlok |
| མཐོ་འཚམ་ | mtho 'tsham | tmdV; 1.,3.SF | Wettstreit halten; konkurrieren | P2 (Finalsatz) |
| དུ་ | du | Konj | um zu | Gliedsatzkonjunktion (Finalsatz) |
| བྱོན་པ་ | byon pa | tmdV; 2.SF (resp.) | reisen; gehen (resp.) | P3:VG3;2.SF |
| ས་ | -s | Konj | als | Gliedsatzkonjunktion |
| ཞལ་ | zhal | Subst. (resp.) | Antlitz; Gesicht (resp.) | dO:Abs |
| མཐོང་ | mthong | tmdV; 1.,2.,3.SF | sehen | P4:VG4;2.SF |
| བས་ | bas | Konj | als; weil | Gliedsatzkonjunktion |
| དད་ | dad | tmdV; 1.,2.,3.SF | glaeubig sein; Vertrauen fassen | P5:VG5;2.SF |
| དེ་ | de | Konj | und | Koordinierende Konjunktion |
| གདམས་པ་ | gdams pa | Subst. | muendliche Unterweisung | dO:Abs |
| ཞུས་པ་ | zhus pa | tdV; 2.SF | bitten; erbitten (eleg.) | P6:VG1;2.SF |
| ས་ | -s | Konj | als; weil | Gliedsatzkonjunktion |
| ཡོན་ཏན་ | yon tan | Subst. | Qualitaet; gute Eigenschaft | dO:Abs (Teil) |
| གྱི་ | gyi | AttrSuf | -- | Genitivmarkierung |
| ཁྱད་པར་ | khyad par | Subst. | Besonderheit; Vorzug | dO:Abs (Teil) |
| ཆེན་པོ་ | chen po | Adj | gross | Attribut (zu khyad par) |
| བརྙེས་ | brnyes | tmdV; 1.,2.,3.SF | erlangen | P7:VG4;2.SF |
Stammformen ('byon pa): 'byon pa -- byon pa -- 'byon pa -- byon (tmdV; resp.) [Quelle: Lekt_14 WL, Nr. 9]
Stammformen (mthong ba): mthong ba -- mthong ba -- mthong ba (tmdV) [Quelle: Lekt_15 WL, Nr. 6]
Stammformen (dad pa): dad pa -- dad pa -- dad pa (tmdV) [Quelle: Lekt_21 WL, Nr. 30]
Stammformen (zhu ba): zhu ba -- zhus pa -- zhu ba -- zhus (tdV) [Quelle: Lekt_11 WL, Nr. 20]
Stammformen (brnyes pa): brnyes pa -- brnyes pa -- brnyes pa (tmdV) [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 47; Lekt_26 HO, S. 2]
Stammformen (mkhas pa): mkhas pa -- mkhas pa -- mkhas pa (tmdV) [Quelle: Lekt_08 WL]
Stammformen (mtho 'tsham pa): mtho 'tsham pa -- mtho 'tshams pa -- mtho 'tsham pa (tmdV) [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 46]
G: { \<TS1kaus:\> khong O \<S:Abs\> mtshan nyid la \<ABlok:PP\> mkhas pas \<P1:VG5;2.SF;Konj\> } { \<TS2temp:\> chos rje'i drung du \<ABlok:PP\> { \<TSfin:\> mtho 'tsham du \<P2:tmdV;1.SF;Konj\> } byon pas \<P3:VG3;2.SF;Konj\> } { \<TS3temp:\> zhal O \<dO:Abs\> mthong bas \<P4:VG4;2.SF;Konj\> } { \<TS4:\> dad de \<P5:VG5;2.SF;Konj\> } { \<TS5kaus:\> gdams pa O \<dO:Abs\> zhus pas \<P6:VG1;2.SF;Konj\> } yon tan gyi khyad par chen po O \<dO:Abs\> brnyes \<P7:VG4;2.SF\> /
Ue: Da er im nichttantrischen Lehrkorpus (mtshan nyid) gelehrt war, reiste [er] zu Chos rje, um [mit ihm] zu wetteifern. Als [er] [dessen] Antlitz erblickte, fasste [er] Vertrauen, erbat muendliche Unterweisungen und erlangte [dadurch] eine grosse Vorzueglichkeit an [geistigen] Qualitaeten.
Anmerkungen:
- khong ("er", resp.) ist ein respektvolles Personalpronomen der 3. Person. [Quelle: Lekt_07 WL]
- mtshan nyid ("Merkmal; Zeichen; hier: nichttantrischer Lehrkorpus") ist in Lekt_24 WL eingefuehrt. In buddhistischen Texten bezeichnet mtshan nyid den nicht-tantrischen Teil der Lehre (Skt. lakshana). [Quelle: Lekt_24 WL]
- mkhas pa ("gelehrt sein", tmdV, VG5) ist in Lekt_08 WL eingefuehrt. mkhas pas: Die Konjunktion -°s verbindet den kausalen Nebensatz mit dem Folgesatz: "weil [er] gelehrt war, ..." [Quelle: Lekt_08 WL; Lekt_29 HO, S. 2--3]
- chos rje ("Chos rje") ist ein gaengiger NZ/Ehrentitel ("Dharma-Herr"). Die UEB-PDF zeigt aufgrund von OCR/Phantom-ta haeufig ཆོས་རེ statt ཆོས་རྗེ; vgl. das HO-Beispiel in Lekt_30 (chos rje de bzhin gshegs pa). [Quelle: Lekt_30 HO, S. 2]
- kyi drung du ("bei") ist in Lekt_30 WL, Nr. 29 als PP eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 29]
- mtho 'tsham du: Finalsatz. mtho 'tsham pa (tmdV; 1.,3.SF; "Wettstreit halten; konkurrieren") ist in Lekt_30 WL, Nr. 46 eingefuehrt. Die Konstruktion mtho 'tsham du = "um zu wetteifern" (1.SF mtho 'tsham + Gliedsatzkonjunktion -du). [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 46]
- Der Satz enthaelt eine Kette von Teilsaetzen, verbunden durch die Konjunktionen -°s (kausale/temporale Bedeutung) und -de (koordinierend): mkhas pas -- byon pas -- mthong bas -- dad de -- zhus pas -- brnyes. Die logische Abfolge: (1) Ursache: Gelehrtheit; (2) Handlung: Reise; (3) Ergebnis: Antlitz sehen, Vertrauen fassen, Unterweisungen erbitten; (4) Schluss: Qualitaeten erlangen.
- zhal mthong: "das Antlitz erblicken" -- ein respektvoller Ausdruck fuer eine Begegnung mit einem hochrangigen Lehrer. zhal ("Antlitz", resp.) ist in Lekt_09 WL eingefuehrt. [Quelle: Lekt_09 WL]
- dad de: dad (2.SF von dad pa, tmdV, VG5) = "Vertrauen fassen; glaeubig werden". de ist die koordinierende Konjunktion (Allomorph von -te nach -d). [Quelle: Lekt_21 WL, Nr. 30; Lekt_30 HO]
- gdams pa ("muendliche Unterweisung") ist in Lekt_10 WL, Nr. 16 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_10 WL, Nr. 16]
- yon tan ("Qualitaet; gute Eigenschaft") ist in Lekt_09 WL eingefuehrt. [Quelle: Lekt_09 WL]
- khyad par ("Besonderheit; Vorzug; Art") ist in Lekt_26 WL eingefuehrt. [Quelle: Lekt_26 WL]
- brnyes (tmdV; 1.,2.,3.SF) = "erlangen" ist in Lekt_30 WL, Nr. 47 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 47]
- Textquelle: Deb ther sngon po (Blaue Annalen) von 'Gos lo tsa ba gZhon nu dpal, Buch 8, Kap. 4 (sGam po pa und seine Schueler). Engl. Uebers.: Roerich, *The Blue Annals*. [Externe Quelle: WisdomLib, Roerich Blue Annals]
- Kontext: Da die betreffende Person im nichttantrischen Lehrkorpus gelehrt war, reiste sie zu Chos re, um zu wetteifern. Beim Anblick seines Antlitzes fasste sie Vertrauen und erlangte durch Unterweisungen grosse geistige Vorzuege.
[Quelle: Lekt_30 UEB, Satz 18]
Satz 19
Tibetisch: རྣལ་འབྱོར་དང་རྣལ་འབྱོར་མ་གཞན་འགའ་རེ་ལ་ཡང་གདམས་པ་སྣ་ཚོགས་གསན་ཞིང་། དད་པ་ཆེན་པོས་བཙལ་བས་ནམ་ཞིག་ནགས་གསེབ་ཅིག་ཏུ་མཇལ་ཏེ། གསེར་རྣམས་ཕུལ་བས་ཐམས་ཅད་གཏོར།
Wylie: rnal 'byor dang rnal 'byor ma gzhan 'ga' re la yang gdams pa sna tshogs gsan zhing / dad pa chen pos btsal bas nam zhig nags gseb cig tu mjal te / gser rnams phul bas thams cad gtor /
Morphemanalyse:
| Tibetisch | Wylie | Wortart | Bedeutung | Grammatische Funktion |
| ----------- | ------- | --------- | ----------- | ---------------------- |
| རྣལ་འབྱོར་ | rnal 'byor | Subst. | Skt. yogin | ABlok (Teil 1) |
| དང་ | dang | Konj | und | Konjunktion (Nominalkoordination) |
| རྣལ་འབྱོར་མ་ | rnal 'byor ma | Subst. | Skt. yoginii | ABlok (Teil 2) |
| གཞན་ | gzhan | IndPron | andere | Attribut |
| འགའ་རེ་ | 'ga' re | IndPron | einige | Attribut |
| ལ་ | la | PP | bei; von | ABlok |
| ཡང་ | yang | FokPart | auch | Fokuspartikel |
| གདམས་པ་ | gdams pa | Subst. | muendliche Unterweisung | dO:Abs (Teil) |
| སྣ་ཚོགས་ | sna tshogs | Adj | verschiedene; mancherlei | Attribut (zu gdams pa) |
| གསན་ | gsan | tdV; 1.,2.,3.SF (resp.) | hoeren; studieren (resp.) | P1:VG4;2.SF |
| ཞིང་ | zhing | Konj | und | Koordinierende Konjunktion |
| དད་པ་ | dad pa | Subst. / tmdV | Glaube; Vertrauen | ABmod (Teil) |
| ཆེན་པོ་ | chen po | Adj | gross | Attribut (zu dad pa) |
| ས་ | -s | KSuf | -- | Instrumentalmarkierung |
| བཙལ་ | btsal | tdV; 2.,3.SF | suchen | P2:VG1;2.SF |
| བས་ | bas | Konj | als; weil | Gliedsatzkonjunktion |
| ནམ་ཞིག་ | nam zhig | Adv | eines Tages | ABtemp |
| ནགས་གསེབ་ | nags gseb | Subst. | Wald | ABlok (Teil) |
| ཅིག་ | cig | IndPart | ein; ein gewisser | Indefinitmarkierung |
| ཏུ་ | tu | PP | in | ABlok |
| མཇལ་ | mjal | tdV; 1.,2.,3.SF (resp.) | treffen; aufsuchen (resp.) | P3:VG2;2.SF |
| ཏེ་ | te | Konj | und | Koordinierende Konjunktion |
| གསེར་ | gser | Subst. | Gold | dO:Abs (Teil) |
| རྣམས་ | rnams | PlSuf | -- | Pluralmarkierung |
| ཕུལ་ | phul | tdV; 2.SF | geben; darbringen | P4:VG1;2.SF |
| བས་ | bas | Konj | als; weil | Gliedsatzkonjunktion |
| ཐམས་ཅད་ | thams cad | IndPron | alles | dO:Abs |
| གཏོར་ | gtor | tdV; 1.,2.,3.SF | fortgeben; wegwerfen | P5:VG1;2.SF |
Stammformen (gsan pa): gsan pa -- gsan pa -- gsan pa (tdV; resp.) [Quelle: Lekt_18 WL, Nr. 30]
Stammformen ('tshol ba): 'tshol ba -- btsal ba -- btsal ba (tdV) [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 48]
Stammformen (mjal ba): mjal ba -- mjal ba -- mjal ba (tdV; resp.) [Quelle: Lekt_17 WL, Nr. 5]
Stammformen ('bul ba): 'bul ba -- phul ba -- dbul ba -- phul (tdV) [Quelle: Lekt_11 WL, Nr. 4]
Stammformen (gtor ba): gtor ba -- gtor ba -- gtor ba (tdV) [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 51]
G: { \<TS1:\> rnal 'byor dang rnal 'byor ma gzhan 'ga' re la yang \<ABlok:PP;FokPart\> gdams pa sna tshogs O \<dO:Abs\> gsan zhing \<P1:VG4;2.SF;Konj\> / } { \<TS2kaus:\> dad pa chen pos \<ABmod:Instr\> btsal bas \<P2:VG1;2.SF;Konj\> } { \<TS3:\> nam zhig \<ABtemp\> nags gseb cig tu \<ABlok:PP\> mjal te \<P3:VG2;2.SF;Konj\> / } { \<TS4kaus:\> gser rnams O \<dO:Abs\> phul bas \<P4:VG1;2.SF;Konj\> } thams cad O \<dO:Abs\> gtor \<P5:VG1;2.SF\> /
Ue: [Er] studierte auch bei einigen anderen Yogins und Yoginiis verschiedene muendliche Unterweisungen. Da [er] mit grossem Glauben [nach ihm] suchte, traf [er] [ihn] eines Tages in einem Wald. [Als er ihm] das Gold darbrachte, verstreute [jener] alles [wieder].
Anmerkungen:
- rnal 'byor ("Skt. yogin") und rnal 'byor ma ("Skt. yoginii") sind in Lekt_08 WL eingefuehrt. [Quelle: Lekt_08 WL]
- gzhan 'ga' re: "einige andere". gzhan ("andere") ist in Lekt_08 WL eingefuehrt; 'ga' re ("einige") ebenfalls in Lekt_08 WL. [Quelle: Lekt_08 WL]
- sna tshogs ("verschiedene; mancherlei") ist in Lekt_30 WL, Nr. 16 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 16]
- gsan zhing: gsan (resp. fuer nyan pa, "hoeren; studieren") mit der koordinierenden Konjunktion -zhing (Allomorph von -cing). Verbindet den Teilsatz mit dem naechsten. [Quelle: Lekt_18 WL, Nr. 30; Lekt_30 HO, S. 3]
- dad pa chen pos: "mit grossem Glauben". Instrumentalsuffix -s (Allomorph zu -kyis) drueckt hier das Mittel/die Art und Weise aus: "mit grossem Glauben [suchend]". [Quelle: Lekt_21 WL, Nr. 30]
- btsal (2.,3.SF von 'tshol ba, tdV): "suchte". Eingefuehrt in Lekt_30 WL, Nr. 48. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 48]
- nam zhig ("eines Tages") ist ein Adverb, eingefuehrt in Lekt_30 WL, Nr. 49. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 49]
- nags gseb ("Wald") ist in Lekt_30 WL, Nr. 50 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 50]
- mjal te: mjal (resp. fuer "treffen; aufsuchen") + koordinierende Konjunktion -te. [Quelle: Lekt_17 WL, Nr. 5; Lekt_30 HO]
- gser rnams ("das Gold", mit PlSuf) ist in Lekt_08 WL eingefuehrt. [Quelle: Lekt_08 WL]
- phul (2.SF von 'bul ba, tdV): "darbringen; geben". [Quelle: Lekt_11 WL, Nr. 4]
- gtor (tdV; 1.,2.,3.SF): "fortgeben; wegwerfen". Eingefuehrt in Lekt_30 WL, Nr. 51. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 51]
- Der Satz besteht aus einer Kette von fuenf Teilsaetzen: (1) gsan zhing (koordinierend); (2) btsal bas (kausal); (3) mjal te (koordinierend-temporal); (4) phul bas (kausal); (5) gtor (Hauptsatz). Die Subjekte wechseln implizit: In TS1--TS3 handelt der Schueler, in TS4 darbringt der Schueler, aber in TS5 gibt der Lehrer alles fort.
- Die Satzstruktur zeigt den Gebrauch der Konjunktionen -zhing und -te (Lekt_30 HO) sowie -°s (Lekt_29 HO) zur Verbindung von Teilsaetzen.
- Textquelle: Deb ther sngon po (Blaue Annalen) von 'Gos lo tsa ba gZhon nu dpal, Buch 4, Kap. 1 (Die Lam 'bras-Ueberlieferung). Engl. Uebers.: Roerich, *The Blue Annals*. [Externe Quelle: WisdomLib, Roerich Blue Annals]
- Kontext: Die betreffende Person studierte bei verschiedenen Yogins und Yoginiis, suchte mit grossem Glauben nach einem Meister, traf ihn in einem Wald und brachte Gold dar, das dieser jedoch fortwarf.
[Quelle: Lekt_30 UEB, Satz 19]
Satz 20
Tibetisch: ལོ་བཅུ་གཉིས་ཤམ་ཐབས་མ་གོན་པར་སྟན་ཐོག་གཅིག་ཏུ་བསྒོམས་པས་གྲུབ་པ་བརྙེས་ཏེ། བསྐྱེད་རིམ་ལ་བརྟན་པ་ཐོབ་པས་ལྷ་དངོས་སུ་གཟིགས།
Wylie: lo bcu gnyis sham thabs ma gon par stan thog gcig tu bsgoms pas grub pa brnyes te / bskyed rim la brtan pa thob pas lha dngos su gzigs /
Morphemanalyse:
| Tibetisch | Wylie | Wortart | Bedeutung | Grammatische Funktion |
| ----------- | ------- | --------- | ----------- | ---------------------- |
| ལོ་ | lo | Subst. | Jahr | ABtemp (Teil) |
| བཅུ་གཉིས་ | bcu gnyis | ZW | zwoelf | ABtemp (Teil) |
| ཤམ་ཐབས་ | sham thabs | Subst. | Unterkleid | dO:Abs (im ABS) |
| མ་ | ma | NegPart | nicht | Negation |
| གོན་པ་ | gon pa | tdV; 1.,2.,3.SF | anziehen | P (ABS) |
| ར་ | -r | Konj | -- | Gliedsatzkonjunktion (modal/ABS) |
| སྟན་ཐོག་ | stan thog | Subst. | Sitzmatte | ABlok (Teil) |
| གཅིག་ | gcig | ZW / IndPart | ein; ein und dieselbe | Attribut (zu stan thog) |
| ཏུ་ | tu | PP | auf | ABlok |
| བསྒོམས་པ་ | bsgoms pa | tdV; 2.SF | meditieren; ueben | P1:VG1;2.SF |
| ས་ | -s | Konj | als; weil | Gliedsatzkonjunktion |
| གྲུབ་པ་ | grub pa | tmdV; 2.SF / Subst. | Verwirklichung | dO:Abs |
| བརྙེས་ | brnyes | tmdV; 1.,2.,3.SF | erlangen | P2:VG4;2.SF |
| ཏེ་ | te | Konj | und | Koordinierende Konjunktion |
| བསྐྱེད་རིམ་ | bskyed rim | Subst. | Skt. utpattikrama; Erzeugungsstufe | ABlok (Teil) |
| ལ་ | la | PP | in; in Bezug auf | ABlok |
| བརྟན་པ་ | brtan pa | Subst. | Festigkeit; Sicherheit | dO:Abs |
| ཐོབ་པ་ | thob pa | tmdV; 2.SF | finden; bekommen | P3:VG4;2.SF |
| ས་ | -s | Konj | weil | Gliedsatzkonjunktion |
| ལྷ་ | lha | Subst. | Gottheit | dO:Abs |
| དངོས་སུ་ | dngos su | Adv | wirklich; unmittelbar | ABmod |
| གཟིགས་ | gzigs | tdV; 1.,2.,3.,4.SF (resp.) | sehen; erblicken (resp.) | P4:VG1;2.SF |
Stammformen (sgom pa): sgom pa -- bsgoms pa -- bsgom pa -- sgoms (tdV) [Quelle: Lekt_10 WL; Lekt_12 WL]
Stammformen ('grub pa): 'grub pa -- grub pa -- 'grub pa (tmdV) [Quelle: Lekt_08 WL, Nr. 2]
Stammformen (brnyes pa): brnyes pa -- brnyes pa -- brnyes pa (tmdV) [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 47; Lekt_26 HO, S. 2]
Stammformen (gzigs pa): gzigs pa -- gzigs pa -- gzigs pa -- gzigs (tdV; resp.) [Quelle: Lekt_04 WL; Lekt_18 WL, Nr. 8]
Stammformen ('thob pa): 'thob pa -- thob pa -- 'thob pa (tmdV) [Quelle: Lekt_08 WL]
Stammformen (gyon pa): gyon pa -- gyon pa -- gyon pa (tdV) [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 53]
G: { \<ABS:\> lo bcu gnyis \<ABtemp\> sham thabs O \<dO:Abs\> ma gon par \<P:Neg;VG1;2.SF;Konj\> } { \<TS1kaus:\> stan thog gcig tu \<ABlok:PP\> bsgoms pas \<P1:VG1;2.SF;Konj\> } grub pa O \<dO:Abs\> brnyes te \<P2:VG4;2.SF;Konj\> / { \<TS2kaus:\> bskyed rim la \<ABlok:PP\> brtan pa O \<dO:Abs\> thob pas \<P3:VG4;2.SF;Konj\> } lha O \<dO:Abs\> dngos su \<ABmod\> gzigs \<P4:VG1;2.SF\> /
Ue: [Er] meditierte zwoelf Jahre lang auf ein und derselben Sitzmatte, ohne ein Unterkleid anzuziehen. Dadurch erlangte [er] die Verwirklichung. Da [er] in der Erzeugungsstufe Festigkeit erlangt hatte, erblickte [er] die Gottheit unmittelbar.
Anmerkungen:
- lo bcu gnyis: "zwoelf Jahre" -- temporale Angabe ohne PP; steht als Zeitdaueradverbial. bcu gnyis ("zwoelf") ist in Lekt_20 WL eingefuehrt. [Quelle: Lekt_20 WL]
- sham thabs ("Unterkleid") ist in Lekt_30 WL, Nr. 52 eingefuehrt. Es handelt sich um das Unterkleid der buddhistischen Moenchsrobe. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 52]
- ma gon par: Adverbialsatz in modaler Funktion. ma (NegPart) + gon pa (1.,2.,3.SF von gyon pa, tdV; "anziehen") + Gliedsatzkonjunktion -r = "ohne anzuziehen". gyon pa ist in Lekt_30 WL, Nr. 53 eingefuehrt. Die Konstruktion folgt dem Schema: ma + Verbalnomen + -r (negierter Adverbialsatz, vgl. Lekt_28 HO, S. 3: ring po ma lon par). [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 53; Lekt_28 HO, S. 3]
- stan thog ("Sitzmatte") ist in Lekt_30 WL, Nr. 54 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 54]
- stan thog gcig tu: "auf ein und derselben Sitzmatte". gcig ("eins") betont hier die Einzigkeit/Unveraenderlichkeit des Sitzplatzes waehrend der gesamten Meditationsdauer.
- bsgoms (2.SF von sgom pa, tdV; "meditieren; ueben") ist in Lekt_12 WL eingefuehrt. [Quelle: Lekt_12 WL]
- bsgoms pas: Die Konjunktion -°s verbindet den kausalen Nebensatz mit dem Hauptsatz: "weil/als [er] meditierte, ..." [Quelle: Lekt_29 HO, S. 2--3]
- grub pa ("Verwirklichung; Skt. siddhi") steht hier als Substantiv (nominalisiertes Verb). [Quelle: Lekt_08 WL, Nr. 2]
- brnyes (tmdV; 1.,2.,3.SF): "erlangen". Eingefuehrt in Lekt_30 WL, Nr. 47. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 47]
- brnyes te: Koordinierende Konjunktion -te verbindet die Verwirklichungserlangung mit dem naechsten Teilsatz. [Quelle: Lekt_30 HO]
- bskyed rim ("Skt. utpattikrama; Erzeugungsstufe") ist in Lekt_30 WL, Nr. 55 eingefuehrt. Es handelt sich um die erste der zwei Stufen der tantrischen Meditation. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 55]
- brtan pa ("Festigkeit; Sicherheit") ist in Lekt_30 WL, Nr. 56 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 56]
- thob (2.SF von 'thob pa, tmdV): "finden; bekommen; erlangen". Eingefuehrt in Lekt_08 WL. Die Konstruktion brtan pa thob pas = "weil [er] Festigkeit erlangt hatte". [Quelle: Lekt_08 WL]
- dngos su ("wirklich; unmittelbar") ist in Lekt_30 WL, Nr. 57 eingefuehrt. [Quelle: Lekt_30 WL, Nr. 57]
- lha dngos su gzigs: "erblickte die Gottheit unmittelbar" -- d.h. hatte eine direkte Vision der Meditationsgottheit. gzigs (resp. fuer lta ba/mthong ba, "sehen; erblicken") ist in Lekt_04 WL und Lekt_18 WL eingefuehrt. [Quelle: Lekt_04 WL; Lekt_18 WL, Nr. 8]
- Der Satz besteht aus zwei Hauptteilen: (1) Zwoelfjaehrige Meditation ohne Unterkleid fuehrt zur Verwirklichung; (2) Festigkeit in der Erzeugungsstufe fuehrt zur unmittelbaren Gottesvision. Beide Teile folgen dem Schema: kausaler Nebensatz (-°s) + Hauptsatz.
- Die Konjunktion -te (brnyes te) verbindet die beiden Hauptteile als koordinierende Konjunktion. [Quelle: Lekt_30 HO, S. 1--4]
- Textquelle: Deb ther sngon po (Blaue Annalen) von 'Gos lo tsa ba gZhon nu dpal, Buch 4, Kap. 1 (Die Lam 'bras-Ueberlieferung) / Buch 7 (Tantrische Ueberlieferungen). Engl. Uebers.: Roerich, *The Blue Annals*. [Externe Quelle: WisdomLib, Roerich Blue Annals]
- Kontext: Zwoelf Jahre lang meditierte die betreffende Person auf ein und derselben Sitzmatte, ohne ein Unterkleid anzuziehen. Durch Festigkeit in der Erzeugungsstufe (bskyed rim) erlangte sie die unmittelbare Gottheitsvision.
[Quelle: Lekt_30 UEB, Satz 20]